अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ११ ] कथाओं में इन सबके प्रमाण मिलते हैं। इसी निपुणता के आधार पर कहीं-कहीं उन्हें विद्याधर भी कहा गया है।१८ प्रायः देखा जाता है कि इस प्रकार के नैपुण्य, सौन्दर्य, गुणवत्ता से सम्पन्न होने पर व्यक्ति चरित्र और नैतिकता की दृष्टि से क्षीण हो जाता है अथवा उन्हें सम्हाल नहीं पाता। गोरक्षचरित्र गुण और शक्ति दोनों का मणिकांचन योग है। ब्रह्मचर्यपरायण और हठयोगा- चारनिष्ठ नैतिकता से सम्पन्न योगिसम्प्रदाय के विकास का मूल श्रेय गोरक्षनाथ को ही है। ऐसे व्यक्ति की रचनाओं में प्राप्त उप- देशों से यह बात स्पष्ट प्रकट होती है कि गोरक्ष ने इस प्रकार संयम- पूर्ण ब्रह्मचर्यपरायण योग का उपदेश देकर यदि उसे जीवन में न उतारा होता तो नाथयोगिसंप्रदाय का यह रूप आज न रहा होता। उनकी कथनी और करनी में अभेद था, यह मानकर ही हम उनकी रचनाओं के आधार पर उनके जीवनचरित्र और गुणों का निष्कर्ष निकाल सकते हैं। चार महासिद्धों की पार्वती द्वारा जो परीक्षा ली गयी, उसमें गोरक्ष को छोड़कर और सभी विचलित होगये। गोरक्ष ने अविचल भाव से ऐसी अप्रतिम सुन्दरी के मातृरूप की ही आकांक्षा की और उसकी गोद में बैठकर स्नेहामृत प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। इस कथांश के आधार पर दो बातें अनुमित की जा सकती हैं। एक तो यह कि गोरक्ष नारी के केवल मातृरूप के पूजक और समर्थक थे और उन्होंने जीवन के लिए ब्रह्मचर्य, संयम, उद्वेगरहित हृदयमार्ग को उचित माना था। यदि उन्होंने इसे आच- रित न किया होता तो वे निश्चय ही मत्स्येन्द्र के उद्धार के लिए न जाकर स्वयं उसी में रम गये होते। उनकी रचनाओं में यह स्पष्ट दिखायी पड़ता है कि वे कंचन और कामिनी दोनों को सहज रहनी और साधनात्मक जीवन के लिए विघातक मानते थे। उद्धार के बाद भी, कामिनी छूटने पर भी, कंचन के प्रति मोह मत्स्येन्द्र के मन में शेष रह गया था। वे एक झोली में स्वर्णमुद्राएं भर लाये थे और छिपा रखा था। गोरक्ष ने सामने के पहाड़ को ही योगबल से स्वर्णमय बना दिया। मत्स्येन्द्र ने झोली नदी में फेंक दी। इससे यह भी स्पष्ट है कि वे यौगिक सिद्धियों का प्रयोग परहितसाधन के १८. वही, पृ० ४७-४८।