अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिए ही करते थे। दूसरी कथाएं भी इस बात की पुष्टि करती हैं। गोरखपुर में उन्होंने योगबल से अन्न वितरण किया। उस समय यौगिक सिद्धियों का प्रयोग जनपीड़न के लिए करनेवाले लोग भी थे। गोरखनाथ की उनसे नहीं पटी। दयानाथ अपनी फूँक से पहाड़ी जंगलों में आग लगा देता था। चामत्कारिक रस्सी से बंधवाकर रहस्यमय डंडे से लोगों को पिटवाता था। पहाड़ों को आकाश में उड़ा देता था। अतः गोरखनाथ ने गोपीचन्द्र के आवा- हन पर उससे कहा : 'लोगों को दुःख न दो, मैं तुम्हें और तुम्हारे अनुवर्तियों तथा परवर्तियों को वरदान देता हूँ कि स्वच्छ श्वेत वस्त्रों और अच्छे घोड़ों की कमी नहीं पड़ेगी।" फिर उन्होंने दयानाथ को अपना शिष्य बनाया। कान फाड़कर कुण्डल पहनाएँ, काले डोरों का साफा सिर पर रखा और दीनोधर वापस भेज दिया।१९ उनकी रचनाओं से और उनके सम्प्रदाय के संगठन से यह बात सिद्ध होती है कि वे वर्णाश्रम-व्यवस्था के भेद-विभेदों को नहीं मानते थे। स्वयं उनका सम्प्रदाय अपने को अति वर्णाश्रमी मानता है। यवनों को भी उन्होंने अपने सम्प्रदाय में स्थान दिया था। मानव- मात्र के प्रति समदृष्टि को वे आवश्यक मानते थे। एक कथा के अनु- सार उन्होंने ज्वालादेवी के मंदिर में हिंसाविरहित मानसी पूजा का सूत्रपात किया था। उनकी कुछ पंक्तियों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि वे भांग, मद्य, मांसादि से बहुत दूर रहते थे। एक कथा से स्पष्ट होता है कि गोरख धनको योगी के लिए आवश्यक नहीं मानते थे। गोरखने रांझा से कहा था—"मैं पृथ्वी पर सोता हूँ। मेरे पास विस्तर नहीं, ओढ़ावन नहीं, कंकण पत्थरों पर सोता हूँ और वियावान में रहता हूँ। योगी तो निर्धन होते हैं। धन उनके पास नहीं होता।”२० उन्होंने अपने लिए कोई निवासस्थान नहीं बनाया था। वे सदैव भ्रमणशील रहे। चार युगों में भिन्न-भिन्न प्रदेशों में उनके निवास अथवा अवतार की जो बात कही जाती है, वह वस्तुतः उन-उन प्रदेशों की उनकी यात्राओं का विवरण है। रांझा की कथा में गोरख को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि युवती स्त्रीको 'बहन' और वयस्काको 'माता' का सम्बोधन दो। १६. गोरखनाथ और उनका युग—पृ० ५१-५२। २०. वही—पृ० ५४ पर उद्धृत ब्रिग्स।