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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

[ १३ ] 'वयस्का स्त्रियों के प्रति उनके हृदय में अत्यन्त श्रद्धा थी। वे उनका माता के समान आदर करते थे। गोरखनाथने स्त्री को केवल माता के ही रूप में देखा, जो स्नेह से बालकको पालती है, जिसमें वासना नहीं रहती।' 'युवती स्त्रियोंको गार्हस्थ्य-धर्म में पतिव्रता के रूप में देखने के इच्छुक थे। उसके कामिनी रूप से उन्हें चिढ़ थी। वे उसकी वासना से घृणा करते थे। लड़कियों का शीलपूर्ण होना उन्हें भाता था। स्त्री के प्रति उनका विचार उनके सिद्धान्तों में बड़ा हाथ रखता है।'२१ संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए भी मस्त रहना उनकी रहनी की विशेषता थी। ऐसी मस्ती में साधना भी निर्विघ्न भाव से चलती रहे, यही उनकी आकांक्षा थी।२२ उनके पाण्डित्य के सम्बन्ध में भी अब प्रायः संदेह नहीं रह गया है। 'अमरौघशासनम्' और 'महार्थमंजरी' यदि उन्हीं की रचनाएँ हैं तो निश्चय ही उन्होंने भारतीय दर्शनों का अच्छा अध्ययन किया था। उनकी हिन्दी रचनाओं से यह बात स्पष्ट होती है कि वे पाण्डित्य को महत्व नहीं देते थे।२३ गोरक्ष का अपने समकालीन सिद्धों से बहुत संघर्ष था। कहा जाता है कि गोरखनाथ और कृष्णपाद या कान्हुपा की साधनापद्धति में भी संघर्ष था। संघर्ष का दूसरा कारण यह था कि गोरखनाथ अपने भक्तों, अनुयायियों और विपत्ति में पड़े लोगों की सहायता के लिए हमेशा दौड़ पड़ते थे। २१. वही—पृ० ५६। २२. 'हसिवा खेलिवा रहिवा रंग। काम क्रोध न करिबा संग॥ हसिबा खेलिवा गाइबा गीत। दिढ करि राखि आपना चीत ॥७॥ हसिवा खेलिवा धरिबा ध्यान। अहिनिसि कथिबा ब्रह्म गियान ॥ हसै खेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ के संग ॥८॥ गोरखबानी, सबदी, पृ० ३-४। २३. 'वेद कतेव न बांणी बांणी। सब ढंकी तलि आंणी ॥ गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या। तह बूझे अलष बिनाणी ॥४॥ वेदे न सास्त्रे कतेबे न कुराणे पुस्तके न बांच्या जाई। ते पद जाना विरला जोगी और दुनी सब धंधे लाई ॥६॥ —गो० बा०, पृ० २-३। ५