अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकान्हिफा, जालन्धर, दयानाथ आदि के साथ उनका संघर्ष कथाओं में प्रसिद्ध है। यह भी संभव है, जैसा कुछ कथाओं से मालूम पड़ता है कि भिन्न साधनमार्ग, जो लोगों को सही रास्ते नहीं ले जाते थे, भी इसके कारण रहे हों। तत्कालीन प्रचलित विभिन्न साधन- संप्रदायों का उनके विरूप से उद्धार और नाथमत में उनका संग- ठन, यह भी उनका एक लक्ष्य था। इसके लिये उन्हें विभिन्न प्रकार के पराक्रम दिखाने पड़े और उनसे सम्बद्ध अनेक कथाएँ, किंवदन्तियाँ तत्तत्प्रदेशों में प्रचलित हो गयीं। अपने संप्रदाय और उसके अनु- यायियों की श्रेष्ठता के लिए उन्हें चिंता रहती थी। इसीलिए वे अपने अनुयायियों को चित्त की दृढ़ता का उपदेश देते थे। भारत में इतना भ्रमण करनेवाले और जनसमाज के संपर्क में आनेवाले, दुखियों के दुःख को देखकर तुरत दौड़ पड़नेवाले के लिए भी चित्त की दृढ़ता अत्यधिक आवश्यक थी। उनका कुछ हिंसक यवनों से भी पाला पड़ा था और उन्होंने उन्हें हिंसा से विरत करने के लिए उपदेश भी दिया था। प्रसिद्ध है कि बहुत से मुसलमान भी उनके शिष्य हो गये थे। हिन्दी की रचनाओं के अनुसार विभिन्न सांप्र- दायिक संन्यासियों के आडंबर की ओर भी उनकी दृष्टि थी और वे नाथयोगियों को उनसे मुक्त रखने के भी अभिलाषी थे। कार्पटिक, नागा, मौनी, दूधाधारी आदि ऐसे ही संन्यासी थे। २४ गोरक्षनाथ का व्यक्तित्व और कृतित्व विभिन्न किंवदन्तियों और लोककथाओं से इतना आवृत है तथा साम्प्रदायिकों द्वारा इस प्रकार की अनैतिहासिक बातें इतनी अधिक मात्रा में प्रसारित की गयी हैं और वे परस्पर इतनी विरुद्ध हैं कि कुछ लोग गोरक्षनाथ को पौराणिक प्रसिद्धिवाला व्यक्ति मानने लगे हैं। अब तक उनकी ऐतिहासिकता और समय के सम्बन्ध में जितना काम हुआ है, वह संक्षेप में नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है। इन सबके आधार पर, मोटे तौर पर, इतना तो निश्चय हो गया है कि गोरक्षनाथ एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे और शंकराचार्य के पश्चात् और रामानुजा- चार्य के पूर्व उनका आविर्भाव हुआ था। वस्तुतः गोरक्षनाथ के समय का विचार अन्य नाथसिद्धों अथवा समकालीन सिद्धों के कालविचार से पूर्णतया पृथक् नहीं किया जा सकता। २४. गोरखबानी—सबदी ३६-४०, पृ० १५, सबदी ७, ९-१०, पृ० ३-४।