अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २४ ] होते जाते हैं। इसी प्रकार गोरक्ष के तत्त्वविज्ञान के अनुसार तत्त्व- विकास (सृष्टिप्रक्रिया) में क्रमशः निम्नलिखित ३६ तत्त्व उत्पन्न होते हैं—उपर्युक्त ५ और ६—माया, ७-११ पंचकंचुक, १२. पुरुष, १३. प्रकृति, १४. महत्, १५. अहंकार, १६-२० पंचतन्मात्र, २१-३१ एकादश इन्द्रिय, ३२-३६ पंचभूत।४६ वस्तुतः यह सारा विकास सिद्धसिद्धान्तपद्धति में 'पिण्डोत्पत्ति' के प्रकरण में वर्णित है। अतः इस सारे विकास को पिण्डोत्पत्ति के अनुसार विभाजित किया गया है। १. परपिण्ड (तत्त्व १-२), २. आद्यपिण्ड (तत्त्व ३-५), ३. साकार पिण्ड (तत्त्व ६-१३), ४. प्राकृत पिण्ड (तत्त्व १४-२०), ५. अवलोकन पिण्ड (तत्त्व २१- ३१), ६. गर्भ पिण्ड (तत्त्व ३२-३६)। गर्भपिण्ड स्थूलतम पिण्ड है और सृष्टिप्रक्रिया में अंतिम स्थूलतम विकास है।४७ स्पष्ट है कि ऊपर की प्रक्रिया ब्रह्माण्ड और पिण्ड की समतुल्य विकास प्रक्रिया है। भेद केवल सत्त्व, रज, तम, काल और प्राणशक्ति की न्यूनता और अधिकता के कारण है। यहां तक कि प्रत्येक पर- माणु तक में उन सभी तत्त्वों की सत्ता स्वीकृत है। पिण्ड मानो ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त संस्करण है।४८ इस प्रकार परशिव (स्वयं) की अवस्था ही परम अवस्था है। नाथमार्ग को कुछ विद्वान् अद्वैतवादी मानते हैं। लेकिन शांकर अद्वैतवाद से स्पष्ट भेद है। काश्मीर शैवाद्वैत दर्शन से इसका स्पष्ट नैकट्य है। सामरस्य, शक्तिकल्पना, परमशिव, सगुण शिव, जगत् का अमिथ्यात्व, परम शिव की इच्छाशक्ति और उसका विकास, पिण्डब्रह्माण्डवाद आदि विचार और सिद्धान्त ऐसे ही हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि नाथ सिद्धाचार्य अपना भेद स्थिर करने के लिए सिद्धान्त की दृष्टि से अपने को द्वैताद्वैतविलक्षणवादी ४६. वही—पृ० १०६। ४७. वही -- पृ० १०७-१०८। ४८. वही- पृ० ११०, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह-पृ० १८ 'ब्रह्माण्डवर्ति यत्किंचित्- पिण्डेऽप्यस्ति सर्वथा।"