भारतकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

कहते हैं, क्योंकि नाथतत्व द्वैत और अद्वैत दोनों से परे है। वह निरुपाधि है और संख्या उपाधि है। वह अवाच्य पद है। जगत् का प्रपंच शक्ति के स्फोट के बाद शुरू होता है। इसलिए शक्ति ही जगत्कर्त्री है, शिव नहीं। इस संप्रदाय में ब्रह्म या शिव की शक्ति को चित्स्वभावा माना गया है और वेदान्तियों में जड़स्वभावा। इसीलिए नाथदर्शन में जगत् चिच्छक्ति का विकास है। धर्मी शिव और धर्म शक्ति को केवल व्यवहारानुरोध से भिन्न मान लिया गया है। चित् ब्रह्म की शक्ति भी चिद्रूपा ही होनी चाहिए। शिव का स्वरूपनिर्धारण अशक्य होने से अभिन्न-भिन्नरूपा शक्ति ही उपास्य हो सकती है। नाथयोगी साधक का लक्ष्य है, शिव और शक्ति का सामरस्यरूप सहज समाधि ' इस प्रकार की शक्ति की उपासना अन्ततः शिवोपासना ही है। व्यवहारानुरोध से ही शक्ति की उपा- सना कही जाती है। डा० कल्याणी मल्लिक ने बताया है कि गोरक्ष का दर्शन प्राचीन- काल के शैवमत के अद्वैतवाद पर आधृत है। किन्तु उनका नाथ तत्व द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार से अतीत है। शिव शुद्ध चिद्रूप हैं और शक्ति उसका 'परिवर्तन और विकास का पक्ष है। नाथ लोग जगत्प्रपंच के अद्वितीय परम कारण को शिव या आदिनाथ के नाम से अभिहित करते हैं। वे स्वरूपतः अनादि, अनन्त, स्वयंसिद्ध, स्वप्रकाश, नित्य तत्त्व, देशकालातीत, सर्व- अवच्छेदहीन और सकल भेद-बाधाशून्य है। वह सर्वथा निरपेक्ष सत्ता है। वे स्वयं निष्कारण और समस्त चराचर के एकमात्र कारण हैं। यह कारणता ही उनकी शक्ति है। इस शक्ति के साथ वे नित्य- युक्त रहते हैं। शिवशक्तिसम्बन्ध के विषय में नाथगण कहते हैं- शिवस्याभ्यन्तरे शक्तिः शक्तेरभ्यन्तरे शिवः। अन्तरं नैव पश्यामि चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥४६ ४६. सिद्धसिद्धातपद्धति ऐंड अदर वर्क्स-भूमिका, पृ० १६, नाथ संप्रदायेर इतिहास०-पृ० २२८; सिद्धसिद्धान्तसंग्रह--पृ० २६-२७, ४.३७; सिद्ध- सिद्धांतपद्धति--४.२६ ।