अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २६ ] एकही अद्वितीय परमतत्त्व दृष्टिभेद से शिव या शक्ति आख्या को प्राप्त करता है । शिव शक्तिरूप होकर सर्वाकारों में स्फुरित होते हैं। दोनों ही अन्योन्याश्रयभूत हैं । धर्म के बिना धर्मी अकल्पनीय है । इस प्रकार दोनों तत्त्वतः अभिन्न हैं-- प्रसरं भासते शक्तिः संकोचं भासते शिवः । तयोः संयोगकर्त्ता यः स भवेद्योगयोगराट् ॥५० इस प्रसार और संकोच का जो आदि और अन्त है, वही साम्यावस्था है और वही निराभास है, वही शिवावस्था है। जब यह साम्य भंग होता है, अर्थात् शक्ति के स्फुरण या प्रसर में स्तरानुसार विश्व का आविर्भाव होता है, तब शक्ति परिणाम लाभ करती है या जगत् आभासित होता है। शक्ति की संकोचन क्रिया के अवसान- काल तक जगत् क्रमशः स्थूल-सूक्ष्म-भेद से आभासित होता है। अतएव जगत् का आभास ही शक्तिभाव और निराभास ही शिव- भाव है। शिव एकरस और अपरिणामी हैं। शक्ति का तिरोभाव ही जगत् का लय है। फिर भी शिव और शक्ति सूर्य और सूर्यकिरण के समान अभिन्न हैं। अतएव शक्ति की साधना से शिवकी उपलब्धि होती है। शक्तिउपासना साधन है और शिवत्वलाभ उसका फल । विमर्श ही शिवकी शक्ति है। इस प्रकार नाथसिद्ध सगुण-सक्रिय, अर्थात् विचित्र ब्रह्माण्डरूपी शिव और निर्गुण, निष्क्रिय शिव नामक ये दो तत्त्व स्वीकार करते हैं। सगुण-निर्गुण, सक्रिय-निष्क्रिय की मिलनभूमि को ही वे नाथस्वरूप कहते हैं।५१ परब्रह्म के स्वरूप के सम्बन्ध में नाथसिद्धान्त यह है कि ईश्वर में क्रिया और अक्रिया, दोनों प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान हैं। पूर्णब्रह्म सक्रिय अथवा निष्क्रिय नहीं है। नाथ और निर्गुण ब्रह्म में भेद है। नाथस्वरूप निर्गुण-सगुण दोनों से अतीत है। नाथ लोग सभी देवताओं से शिवको उत्तम मानते हैं और शिव से भी उत्तम नाथ को। गोरखसिद्धान्तसंग्रह का कथन है कि गोरख के अनुसार ५०. नाथ सम्प्रदायेर इतिहास०-पृ० २२८-२२६, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह-पृ० ३६-३७, ६.६ । ५१. नाथ सम्प्रदायेर इतिहास०--पृ० २३०-२३१ ।