अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
कहते हैं, क्योंकि नाथतत्व द्वैत और अद्वैत दोनों से परे है। वह निरुपाधि है और संख्या उपाधि है। वह अवाच्य पद है। जगत् का प्रपंच शक्ति के स्फोट के बाद शुरू होता है। इसलिए शक्ति ही जगत्कर्त्री है, शिव नहीं। इस संप्रदाय में ब्रह्म या शिव की शक्ति को चित्स्वभावा माना गया है और वेदान्तियों में जड़स्वभावा। इसीलिए नाथदर्शन में जगत् चिच्छक्ति का विकास है। धर्मी शिव और धर्म शक्ति को केवल व्यवहारानुरोध से भिन्न मान लिया गया है। चित् ब्रह्म की शक्ति भी चिद्रूपा ही होनी चाहिए। शिव का स्वरूपनिर्धारण अशक्य होने से अभिन्न-भिन्नरूपा शक्ति ही उपास्य हो सकती है। नाथयोगी साधक का लक्ष्य है, शिव और शक्ति का सामरस्यरूप सहज समाधि ' इस प्रकार की शक्ति की उपासना अन्ततः शिवोपासना ही है। व्यवहारानुरोध से ही शक्ति की उपा- सना कही जाती है। डा० कल्याणी मल्लिक ने बताया है कि गोरक्ष का दर्शन प्राचीन- काल के शैवमत के अद्वैतवाद पर आधृत है। किन्तु उनका नाथ तत्व द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार से अतीत है। शिव शुद्ध चिद्रूप हैं और शक्ति उसका 'परिवर्तन और विकास का पक्ष है। नाथ लोग जगत्प्रपंच के अद्वितीय परम कारण को शिव या आदिनाथ के नाम से अभिहित करते हैं। वे स्वरूपतः अनादि, अनन्त, स्वयंसिद्ध, स्वप्रकाश, नित्य तत्त्व, देशकालातीत, सर्व- अवच्छेदहीन और सकल भेद-बाधाशून्य है। वह सर्वथा निरपेक्ष सत्ता है। वे स्वयं निष्कारण और समस्त चराचर के एकमात्र कारण हैं। यह कारणता ही उनकी शक्ति है। इस शक्ति के साथ वे नित्य- युक्त रहते हैं। शिवशक्तिसम्बन्ध के विषय में नाथगण कहते हैं- शिवस्याभ्यन्तरे शक्तिः शक्तेरभ्यन्तरे शिवः। अन्तरं नैव पश्यामि चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥४६ ४६. सिद्धसिद्धातपद्धति ऐंड अदर वर्क्स-भूमिका, पृ० १६, नाथ संप्रदायेर इतिहास०-पृ० २२८; सिद्धसिद्धान्तसंग्रह--पृ० २६-२७, ४.३७; सिद्ध- सिद्धांतपद्धति--४.२६ ।
[ २६ ] एकही अद्वितीय परमतत्त्व दृष्टिभेद से शिव या शक्ति आख्या को प्राप्त करता है । शिव शक्तिरूप होकर सर्वाकारों में स्फुरित होते हैं। दोनों ही अन्योन्याश्रयभूत हैं । धर्म के बिना धर्मी अकल्पनीय है । इस प्रकार दोनों तत्त्वतः अभिन्न हैं-- प्रसरं भासते शक्तिः संकोचं भासते शिवः । तयोः संयोगकर्त्ता यः स भवेद्योगयोगराट् ॥५० इस प्रसार और संकोच का जो आदि और अन्त है, वही साम्यावस्था है और वही निराभास है, वही शिवावस्था है। जब यह साम्य भंग होता है, अर्थात् शक्ति के स्फुरण या प्रसर में स्तरानुसार विश्व का आविर्भाव होता है, तब शक्ति परिणाम लाभ करती है या जगत् आभासित होता है। शक्ति की संकोचन क्रिया के अवसान- काल तक जगत् क्रमशः स्थूल-सूक्ष्म-भेद से आभासित होता है। अतएव जगत् का आभास ही शक्तिभाव और निराभास ही शिव- भाव है। शिव एकरस और अपरिणामी हैं। शक्ति का तिरोभाव ही जगत् का लय है। फिर भी शिव और शक्ति सूर्य और सूर्यकिरण के समान अभिन्न हैं। अतएव शक्ति की साधना से शिवकी उपलब्धि होती है। शक्तिउपासना साधन है और शिवत्वलाभ उसका फल । विमर्श ही शिवकी शक्ति है। इस प्रकार नाथसिद्ध सगुण-सक्रिय, अर्थात् विचित्र ब्रह्माण्डरूपी शिव और निर्गुण, निष्क्रिय शिव नामक ये दो तत्त्व स्वीकार करते हैं। सगुण-निर्गुण, सक्रिय-निष्क्रिय की मिलनभूमि को ही वे नाथस्वरूप कहते हैं।५१ परब्रह्म के स्वरूप के सम्बन्ध में नाथसिद्धान्त यह है कि ईश्वर में क्रिया और अक्रिया, दोनों प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान हैं। पूर्णब्रह्म सक्रिय अथवा निष्क्रिय नहीं है। नाथ और निर्गुण ब्रह्म में भेद है। नाथस्वरूप निर्गुण-सगुण दोनों से अतीत है। नाथ लोग सभी देवताओं से शिवको उत्तम मानते हैं और शिव से भी उत्तम नाथ को। गोरखसिद्धान्तसंग्रह का कथन है कि गोरख के अनुसार ५०. नाथ सम्प्रदायेर इतिहास०-पृ० २२८-२२६, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह-पृ० ३६-३७, ६.६ । ५१. नाथ सम्प्रदायेर इतिहास०--पृ० २३०-२३१ ।
[ २७ ] विश्वकर्तृत्व नाथ का नहीं है, शिव का है। शिव ही विश्वकर्ता हैं और नाथ निर्गुण निरुपाधिरूप हैं। अतः उनके लिए प्राकृतिक कार्य-कारण का कोई माहात्म्य नहीं है। विश्व के सृष्टिकर्ता सगुण सोपाधि शिव हैं। ५२ सिद्धमत में परमतत्त्व को द्वैताद्वैतविवर्जित कहा गया है। यही सिद्धमत का वैशिष्ट्य है। यह विवर्जितत्व ही पूर्ण सत्य है। निर्गुण ब्रह्म और सिद्धों के नाथ में भेद-प्रभेद यह है कि नाथ अद्वैतोपरि और निराकार-साकारातीत हैं। इसी नाथ से निराकार ज्योतिर्नाथ और साकार नाथ का जन्म होता है। साकार नाथ से सदाशिव, भैरव और उनकी शक्ति भैरवी का जन्म होता है। नाथ सर्वविलक्षण अर्थात् 'यादृश एव तादृश एव' हैं। उनकी कोई तुलना नहीं। वे ही महासिद्धों के लक्ष्य हैं। ५३ नाथदर्शन के अनुसार जीवन्मुक्ति की ही अवस्था आदर्श अवस्था है। देहपात में जो मुक्ति होती है, उसे यथार्थ मुक्ति नहीं कहा गया है। कारण यह है कि यह मुक्ति देहपातरूप प्रतिबन्धक द्वारा बाधित है। नाथ गण कहते हैं कि जिस देह से परमपदप्राप्ति होती है, उसी देह की रक्षा, अजर-अमर करना कर्तव्य है। विदेह-मुक्ति में इस देह का ही त्याग हो जाता है। 'योगबीज' में कहा गया है- "अजरामरपिण्डो यो जीवन्मुक्तः स एव हि।" जीवन्मुक्तियोग में दैहिक परिवर्तन साधित होता है। इस सिद्ध- देह का लाभ होने पर योगी के लिए इच्छामृत्युवरण संभव हो जाता है। वेदान्त का आत्मसाक्षात्कार नाथमार्ग की परमपद प्राप्ति है, किन्तु साथ ही नाथ लोग उस देह को ही स्थायी करने के लिए सचेष्ट हैं। योग से सिद्धयोगी प्रारब्ध का क्षय करता है। तत्पश्चात् देह को रखे या न रखे, यह उसकी इच्छा पर निर्भर है। सिद्धमत में देह ही आत्मा है। विक्षेप के दूर न होने पर शुद्ध देहलाभ नहीं होता। शक्तियुक्त चैतन्य को सिद्ध लोग स्वीकार करते हैं। उसको जीतकर विशेष रूप से अज्ञान को दूर कर मुक्तिलाभ होता है। योगी चैतन्यशक्ति का जय करके कालजयी होता है। योगी का शरीर ही योगदेह है। सिद्धमत है कि जो मृत्यु को प्राप्त करता है, वह मुक्त ५२. वही-पृ० २५४-२५६ ।
[ २८ ] नहीं है। परामुक्त का देहपात नहीं होता ।⁵⁴ नाथमत में मोक्ष वह अवस्था मानी गयी है जिसमें समाधि के क्रम से मन द्वारा मन का अवलोकन किया जाता है। इसी को जीवन्मुक्ति पद कहा गया है ।⁵⁵ नाथयोगी का लक्ष्य होता है ऐसे शरीर की प्राप्ति जिसका पतन न हो, जिसके बाहर प्राण न जाता हो। इनका लक्ष्य वह अवस्था है जिसमें शरीर भी ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। शरीर चिन्मय हो जाता है और फिर अनन्यता की प्राप्ति होती है। यह पिंडसिद्धि परमपद की प्राप्ति का अनिवार्य सोपान है। इस प्रकार संक्षेप में नाथों का लक्ष्य है जीवन्मुक्तियुक्त सिद्ध देह से नाथरूप में अवस्थान या पिंडपद का परमपद में समरसीकरण ।⁵⁶ महामहो- पाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज ने नाथों के जीवन्मुक्तिक्रम का इस प्रकार व्याख्यान किया है—“इस मत के अनुसार सद्गुरु की कृपा से चित्तविश्रांतिलाभ सबसे पहले होना चाहिए, क्योंकि बिना उसके सामरस्यप्राप्ति नहीं हो सकती। जबतक चित्त देहात्मबोध मूलक क्षोभ से मुक्त न हो, तब तक इसमें शांति नहीं होती और यथार्थ साधना का प्रारंभ नहीं होता। चित्त-विश्रांति से स्वभावतः भगवदानंद और अनंत ज्योतियों का आविर्भाव होता है। इस अद्वय प्रकाश से द्वैत भाव निवृत्त हो जाता है। इसके बाद चित् शक्ति का प्रकाश होता है और योगी निज देह के पूर्णज्ञान को प्राप्त करता है। इसका फल है देह सिद्धि या पिंडसिद्धि। इसका नामान्तर है देह का अमरत्व । इसे नामान्तर से सिद्ध अवस्था कह सकते हैं। परन्तु अभी भी जो यथार्थ अंतिम लक्ष्य है, वह दूर है। इस समय योगी की देह ज्योतिर्मय आकार को लेकर प्रकाशमान होती है। यह चैतन्य की सारभूत सत्ता है। परमपद के नित्य सिद्ध प्रकाश के साथ इस प्रकाशमय आकार का एकत्वसंपादन ˙˙˙ सुदीर्घकाल तक आत्मा के स्वरूपानुसंधान में तल्लीन रहने से हो सकता है। यही ५३. नाथ संप्रदायेर इतिहास०-पृ० २६६, २७१ । ५४. वही—पृ०२६२, २६३, २६६-२६७, ३०१, ३०३ । ५५. अमरौघशासनम्—पृ० ६ । ५६. नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन-डा० ना० उपाध्याय, पृ० २७३ ।
[ २६ ]
सामरस्य है । ' ' ' सामरस्य और निरुत्थान दशा, दोनों के अंतराल में कुछ अवस्थाओं का पता चलता है । पूर्ण स्वातन्त्र्य से समन्वित आत्मा का स्फुरण निरुत्थान दशा के नाम से प्रसिद्ध है । ' ' ' नाथयो- गियों का लक्ष्य यह है कि पहले पिंडसिद्धि के द्वारा जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो । इस समय में कालवंचन सिद्ध होता है । अर्थात् काल के प्रभाव से योगी मुक्त हो जाता है । इसके अनन्तर समरसीकरण के द्वारा परा मुक्ति की सिद्धि होती है । प्रकारान्तर से कहा जा सकता है कि पिंडसिद्धि या जीवन्मुक्ति के अनन्तर ओंकार साधना के द्वारा परामुक्ति का आविर्भाव होता है ।५७ ऊपर बतायेगये नाथों के लक्ष्य से यह बात स्पष्ट हो गयी कि नाथों के दो लक्ष्य हैं—प्रथम गौण और द्वितीय मुख्य । गौण लक्ष्य है पिण्डसिद्धियुक्त जीवन्मुक्ति और मुख्य लक्ष्य है पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण । यदि पहले की दार्शनिक तत्त्वज्ञानात्मक विचारणा को ध्यान में रखा जाय तो यह दूसरा लक्ष्य पूर्णतया स्पष्ट हो जायगा । इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नाथसंप्रदाय में विशेषकर गोरक्षनाथ के ग्रंथों में साधनाक्रम का पूर्ण प्रकाशित रूप मिलता है । गोरक्ष के साधनमार्ग में 'गुरु' को बहुत महत्व दिया गया है । परमपद में समरसीकरण, जो नाथों का चरम लक्ष्य है, गुरु की कृपा से ही होता है । गुरुचरणों में रत रहने से स्वसंवेद्य परमपद की सिद्धि सम्भव बतलायी गयी है । केवल इसी साधन से योगियों को पिण्ड के निरुत्थान का अनुभव होता है तथा उसके पश्चात् समरसीकरण की सिद्धि होती है ।५८ सिद्धसिद्धान्तपद्धति में कहा गया है कि सिद्धपुरुष अदैहिक साधनों का आश्रयण कर परमपद को प्राप्त करते हैं और इन साधनों में स्थिति गुरु के दृक्पात से होती है । इसलिए गुरु से बड़ा कोई नहीं है । वह अपनी करुणा के खड्गपात से पशु (साधक) के आठों प्रकार के पाशों का छेदन
५७. वही—प्राक्कथन—म० म० डा० गोपीनाथ कविराज, पृ० ५-६ । ५८. नाथ और सन्त-साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन—डा० ना० उपाध्याय, पृ० २६७; सि० सि० प० अ० ना० यो० : सम्पादक—डा० कल्याणी मल्लिक, सिद्धसिद्धान्तपद्धति, ५.१-१२ । ५
[ ३० ] करता है। उसकी इस प्रकार की क्रिया से साधक सम्यक् आनन्द में मग्न हो जाता है। उसकी यह कृपा विश्रांतिकारक होती है। बिना स्वात्मगत विश्रांति के पिंडपद का परमपद में समरसीकरण नहीं हो सकता। शास्त्र, अनुमान, तर्क आदि से भ्रांत करनेवाला गुरु गुरु नहीं। उपर्युक्त गुण-धर्मों से समलंकृत गुरु को प्राप्त कर शिष्य जन्म और संसार-बंधन से मुक्त हो जाता तथा परानन्दमय होकर निष्कल शिवत्व की उपलब्धि करता है।५९ प्रकृति के सभी विकारों का अवधूनन करनेवाला सिद्ध ही, अवधूत योगी ही सद्गुरु का पद प्राप्त कर सकता है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति में सिद्ध योगी अवधूत को अत्याश्रमी, योगी, सिद्धयोगी, जितेन्द्रिय आदि कहा गया है।६० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह में षोडशनित्यातन्त्र का उद्धरण देकर गुरु रूप में शिव को नमस्कार किया गया है। गुरु की ही कृपा से स्वल्प कल्प मात्र से सहज सिद्धि प्राप्त होती है। इस गुरु को ३६ लक्षणों से सम्पन्न होना चाहिए। अधिक तत्वों से गुरु कहा जाता है। गुरु से शिष्य के ४ लक्षण कम होते हैं अर्थात् उसमें ३२ लक्षण आवश्यक माने गये हैं। इनसे कम लक्षणों से युक्त सिद्ध व्यक्ति को गुरु रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए। ३२ से कम लक्षणों से युक्त व्यक्ति को शिष्य भी नहीं बनाना चाहिए। इन ३२ लक्षणों के लिए आठ परीक्षाएं स्वीकार की गयी हैं। गोरक्ष- सिद्धान्तसंग्रह में वर्णित ये लक्षण अवधूत-सम्प्रदाय के अनुसार बताये गये हैं।६१ संक्षेप में हम इसे 'गोरक्षनाथ का गुरु-शिष्यवाद और अधिकार-भेदवाद' कह सकते हैं। नाथ मार्ग का परमपद 'नाथ' है। गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहकार ने 'नाथस्वरूपेणावस्थानम्' को ही लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया है। नाथ के सम्बन्ध में पहले ही कहा गया है कि प्रसार और संकोच का जो आदि अन्त है, वही साम्यावस्था है, वही निराभास है, वही शिवावस्था है। यह समरसावस्था ही अद्वयावस्था है और यही समाधि ५९. सि० सि० ग्र० व० ना० यो० में सिद्धसिद्धान्तपद्धति, ५.५४-८१ । ६०. वही, सिद्धसिद्धान्तपद्धति : सम्पूर्ण षष्ठ उपदेश । ६१. गो० सि० सं०, पृ० ३१-३२, ४५, ४६, १४, ४०, ५६-५७ । नाथ और सन्त साहित्य : पृ० २६८-७० ।
२. द्वितीय अध्याय: अमनस्क राजयोग, मनोलय प्रक्रिया एवं नाद-लय
[ ३१ ] की स्थिति है। इस प्रकार समरस और अद्वय रूप से अवस्थान ही नाथस्वरूप से अवस्थान है।६२. इस समरसीकरण के लिए, गुरुकृपा से पिण्डसंवित्ति के लिए शुद्ध या दिव्यदेह की आवश्यकता है। बिना गुरु-कृपा और शुद्ध देह के इस लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती। इसी- लिए गोरक्ष के साधनमार्ग में यह कायसिद्धि आवश्यक मानी गयी है, जिसका लक्ष्य समरसीकरण है।६३ नाथमतानुसार मोक्ष वह अवस्था है, जिसमें समाधि के क्रम से मन द्वारा मन का अवलोकन किया जाता है। इसी को आगे जीवन्मुक्ति पद कहा गया है।६४ इसी प्रकार इस जीवन्मुक्ति के लिए कायसिद्धि और कायसिद्धि के लिए पिण्डज्ञान आवश्यक है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार योगी को पिण्डगत नवचक्र, षोडशाधार, तीन लक्ष्य, पंचव्योम अवश्य जानना चाहिए। अन्यत्र गोरक्ष ने कहा है कि जो योगी पिण्डगत एक स्तम्भ, नव द्वार, पंचदेवता आदि को नहीं जानता, वह सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता। तत्त्वविज्ञान की दृष्टि से ब्रह्माण्ड का जो समतुल्य और विकासात्मक वर्णन प्रस्तुत किया गया है, उसका यही प्रयोजन है। उपर्युक्त समरसीकरण के लिए 'योगबीज' योगरहित ज्ञान और ज्ञानरहित योग की निरर्थकता बतलाते हुए योगयुक्त ज्ञान को ही मोक्षोपाय के रूप में स्वीकार करता है।६५ उपर्युक्त विवेचन से मिलान करने पर संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पिण्डसिद्धि परमपद की प्राप्ति का अनिवार्य सोपान है। अर्थात् नाथों का लक्ष्य जीवन्मुक्तियुक्त सिद्धदेह से नाथरूप से अवस्थान या पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण है।६६ ६२. सि० सि० ग्र० व० ना० यो०-इंट्रो०, पृ० २१। ६३. नाथ और सन्त साहित्य—पृ० २७०-२७१। ६४. अमरौघशासनम् : पृ० ६। ६५. सि० सि० प०-२.३१। गोरक्ष संहिता-१.१३-१४। गोरक्षपद्धति- १.१३-१४। ६६. नाथ और संतसाहित्य (तु० ग्र०) पृ० २७२-२७३। योगबीजम्- श्लो० १५-१६।
[ ३२ ] परिपक्व देह या सिद्धदेह की प्राप्ति के लिए योग ही उपाय है। नाथयोगी हठयोग को प्रधान मानते हैं। हठयोग से राजयोग की सिद्धि होती है। हठयोग प्राणायामप्रधान है। मन्त्रयोग, लययोग और राजयोग में भी प्राणायाम और हठयोग सहायक है। प्राण अधिभूत तत्त्व है। अतः इस दृष्टि से प्राणायाम या हठयोग आधि- भौतिक साधन है। एक सफल ध्यानयोगी शरीर और स्वास्थ्य से क्षीण, दुर्बल अल्पायु और रोगी हो सकता है किंतु वह अपनी इच्छा से शरीर त्याग नहीं कर सकता। हठयोग की क्रियाओं से सिद्धदेह या परिपक्व देह की प्राप्ति होती है। मानस साधन के लिए ऐसा शरीर सर्वाधिक उपयुक्त और उचित माध्यम हो सकता है। ऐसे योगी की मृत्यु इच्छा-मृत्यु होती है। गोरक्षनाथादि ने हठयोग या उससे प्राप्त सिद्धियों को भी लक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया। ६७ हठयोगप्रदीपिका में स्पष्टतः कहा गया है कि राजयोग में आरूढ़ होने के लिए हठयोगविद्या का अभ्यास करना चाहिए। ६८ इस योगाभ्यास के आरम्भ के लिए नाथाचार्यों ने संयम का विधान किया है। घेरण्डसंहिता की तरह ही स्वात्मारामरचित हठयोगप्रदीपिका में भी हठयोग का अभ्यास आरम्भ करने के पूर्व आहार, अपथ्य, पथ्य, भोजन आदि से सम्बद्ध संयमों के पालन का उपदेश किया गया है। योगाभ्यास के प्रतिबन्धकों के विवरण में अत्याहार, परिश्रम, प्रजल्पन ( या बहुभाषण ), यमग्रहण ( स्नान, रात्रि में ही भोजनग्रहण, फलाहारादि का नियम ग्रहण ) जनसंगम, चंचलता इन छः की गणना की गयी है। योगसाधकों में उत्साह, साहस, धैर्य, तत्वज्ञान, निश्चय, जगत्संगपरित्याग इन छः की गणना की गयी है। बताया गया है कि यम में मिताहार मुख्य है तथा नियम में अहिंसा । ६९ हठयोगप्रदीपिका के यमनियमसम्बन्धी श्लोक मूल श्लोकों में अन्तर्गणित नहीं हैं। वे ही श्लोक थोड़े-से अन्तर से तांत्रिक ग्रन्थ 'शारदातिलक' में मिलते हैं। ६७. नाथयोग : अक्षयकुमार बनर्जी, पृ० १६ । ६८. हठयोगप्रदीपिका १.१ । ६९. हठयोगप्रदीपिका—१.५७-६३, १.१५, १६, १.३८, ४० । विस्तार के लिए द्रष्टव्य—नाथ और सन्त साहित्य , पृ० २७५-२७७ ।
[ ३३ ] हठयोग शब्द की विभिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं, जो इस प्रकार हैं : ह + ठ + योग = सूर्य + चन्द्र + योग ह + ठ + योग = प्राण + अपान + योग ह + ठ + योग = दक्षिण + वाम + योग ह + ठ + योग = यमुना + गंगा + योग ह + ठ + योग = पिंगला + इड़ा + योग ह + ठ + योग = रजस् + रेतस् + योग ।७० गोरक्षनाथ का योग षडंग है । अर्थात् इसमें आसन के बाद के पंतजलि के ६ अंग स्वीकृत हैं । यम-नियम को सामान्यतया अनि- वार्य समझकर छोड़ दिया है । आसनस्थैर्य के बाद प्राणायाम के अभ्यास का विधान है । इस प्राणायाम का नाड़ीशोधन से घनिष्ठ सम्बन्ध है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार प्राणायाम प्राण की स्थिरता है। रेचक, पूरक, कुम्भक और संघट्टीकरण इसके चार लक्षण हैं।७१ बताया गया है कि प्राणायाम के अभ्यास से यदि पवन को गगन में प्रेरित किया जाय तो घंटा वाद्यादिकों की ध्वनियां उत्पन्न होती हैं तथा सिद्धि की प्राप्ति की सम्भावना होती है ।७२ इस प्रकार प्राणायामाभ्यास में अग्रसर होने पर उसका संबंध नादानुसंधान से भी सिद्ध होता है । इस प्रकार आसन और प्राणायाम के पूर्णाभ्यास से सम्पन्न होकर धारणा का अभ्यास करने का विधान किया गया है ।७३ गोरक्षसंहिता, योगबीज आदि ग्रन्थों में प्राणायाम के साथ मुद्रा, बन्ध, वेध का भी वर्णन सम्बद्ध भाव से वर्णित है । किन्तु ऐसा मालूम होता है कि प्राणायाम की तुलना में इन्हें अधिक महत्व नहीं दिया गया है । प्राणायाम से ओंकारसाधन ७०. हठयोगप्रदीपिका—१·१ तथा उसकी टीका, वही ३·१५ तथा उसकी टीका, योगबीजम् १·८३-६०, नाथ सम्प्रदाय-पृ० १०३ । ७१. सि० सि० प०—२·३५ । ७२. गो० सं०—२·१८-२०; योगामार्तण्ड—१०८ । ७३. गोरक्ष संहिता—२.२१,५२ ।
[ ३४ ] भी सम्बद्ध है। ओंकारसाधन और अजपाजप दोनों ही प्राणायाम में अन्तर्भूत हैं। 'ओंकार' की विस्तृत प्रतीकात्मक व्याख्या गोरक्ष-ग्रन्थों में उपलब्ध है। गोरक्षादि सिद्धाचार्य इस प्रणव को वेद का सार नहीं, वेद मानते हैं। इसी को शिवशक्ति-साधन भी कहा गया है। ओंकार को आदिनाद कहा गया है। यह अनाहत और अखण्ड है। इसका अनुसंधान ही नादानुसंधान है। अन्तस् में इसकी सत्ता ही ब्रह्म की अन्तस् में सत्ता है। उसे नाद-ब्रह्म कहते हैं। इसका अनुसंधान ब्रह्मानुसंधान है। ७४ सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार चैतन्य-तरंगों का प्रत्याहरण, नाना प्रकार के विकारों से चित्त के ग्रस्त हो जाने के कारण उत्पन्न विकारों से भी निवृत्ति प्रत्याहार का लक्षण है। गोरक्षसंहिता में चक्षु आदि के अपने विषयों में विचरण से आहरण को प्रत्याहार कहा गया है। प्रत्याहार से योगी अपने मानस-विकारों का मोचन करता है। ७५ धारणा में बाह्य और अन्तस् के एकमात्र निजतत्त्वस्व- रूप का अन्तःकरण से साधन किया जाता है। जो कुछ उत्पन्न होता है, उसे निराकार में धारण—जीवात्मा का निर्वात दीप की तरह धारण—ये धारणा के लक्षण हैं। इससे मानसस्थैर्य की प्राप्ति बतायी गयी है। हृदय में पंचभूतों के पृथक् धारण तथा मानस के निश्चलत्व के धारण के कारण ही इसे धारणा कहते हैं। भूत-तत्त्वों के अनुसार ही यह धारणा भी पांच प्रकार की मानी जाती है। इन धारणाओं के बाद सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार चित्त का निरा- कार निजतत्त्व में एकत्व तथा आत्मा का निर्वातदीपत्व सिद्ध होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि कुंडलिनी-योग की साधना धार- णान्तर्गत है। इस कुंडलिनीयोग से हो लययोग, भूतजय, भूतलय, भूतशुद्धि, षट्चक्रभेद आदि संबद्ध हैं। कुंडलिनी की मूलाधार से से सहस्रार तक की यात्रा को पृथिवी से आकाश तक की यात्रा कहा गया है। यह आध्यात्मिक यात्रा है। यह साधन आध्यात्मिक साधन है। इस कुंडलिनी को षोडशी तथा उसकी साधना को षोडशीसाधना
७४. नाथ और संत साहित्य—पृ० २८३-२८८ । ७५. सि० सि०प०—२.३६; गो० सं०—२.२३-३१; योग-मार्तण्ड ११३-११६ ।
[ ३५ ] कहा गया है । पिण्ड-ब्रह्माण्ड-एकत्व का सिद्धान्त इस साधन का ही सिद्धांत पक्ष है । गोरख-मत के मान्य चक्रों की कुछ निश्चित संख्या नहीं बतायी जा सकती । फिर भी तांत्रिकों के कुल सात चक्र अधि- कांशतः और सामान्यतः स्वीकृत हैं ।⁷⁶ सिद्धसिद्धान्तपद्धति में कहा गया है कि ध्यान परमाद्वैतभाव है । जिन-जिन तत्वों या पदार्थों का स्फुरण होता है, आत्मा उनकी अपने ही स्वरूप के अनुसार भावना करती है । इस प्रकार ध्यान में सभी भूतों में समदृष्टि हो जाती है । इस ध्यान-साधन में चित्त पूर्ण- रूप से निश्चल रहता है । सगुण और निर्गुण नामक दो प्रकार के ध्यान बताये गये हैं । सगुण ध्यान विभिन्न वर्णों (रंगों) वाला होता है तथा निर्गुण ध्यान केवल ज्ञानात्मक, अनुभृत्यात्मक । स्थूल और सूक्ष्म भेद से भी ध्यान दो प्रकार का होता है । स्थूल ध्यान के बाद तेजोध्यान या ज्योतिर्ध्यान और सूक्ष्म ध्यान का वर्णन किया गया है ।⁷⁷ समाधि में सभी तत्वों की सम-अवस्था रहती है, निरू- द्यमत्व और अनायास की स्थिति रहती है । इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है जिसमें शुभ-अशुभ कार्यों का त्याग हो जाता है, विश्वतो- मुख अनन्त परम ज्योति का साक्षात्कार होता है । जब प्राण सम्यक् प्रकार से क्षीण हो जाते हैं तथा मानस भी लय को प्राप्त हो जाता है, जब समरसत्व की प्राप्ति हो जाती है, तब कहा जाता है कि समाधि की अवस्था प्राप्त हो गयी । इस समय अपना - पराया कुछ भी नहीं रहता । हठयोगप्रदीपिका में इस स्थिति के विभिन्न नाम बताये गये हैं : राजयोग, समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमरत्व, लय, तत्व, शून्याशून्य, परमपद, अमनस्क, अद्वैत, निरालम्ब, निरं- जन, जीवन्मुक्ति, सहजा, तुर्या । इन शब्दों की अलग-अलग विस्तृत व्याख्याएं मिलती हैं ।⁷⁸ इस प्रकार गोरख के षडंग-योग के दो उद्देश्य बताये गये हैं । ७६. नाथ और संत साहित्य—पृ० २८८-२६६ ७७. सि० सि० प०-२.३८; योगमार्तण्ड-१०२, १५७; गो० प०-२.६५-७५; योगमार्तण्ड-१५६-१६६; घेरण्डसंहिता-६.२-२२ । ७८. नाथ और संत साहित्य--पृ० २६७-२६८ ।
[ ३६ ] प्रथम गौण उद्देश्य है सिद्धदेह या दिव्यदेह की प्राप्ति या जीवन्मुक्ति। दूसरा मुख्य उद्देश्य है द्वैताद्वैत-विवर्जित नाथरूप में अवस्थान या पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण। संस्कृत-ग्रन्थों के आधार पर उपस्थित किये गये इस गोरक्ष-योग में दो प्रधान साधन हैं : हठयोग और लययोग। इसी प्रकार दो कार्य हैं:—विन्दुरक्षा और नादानुसंधान। गोरक्ष योगसाधना का मुख्य तत्व है प्राणायाम। दोनों कार्य इसी से साधित होते हैं। इसी आधार पर नाथ लोगों का यह भी कथन है कि यह स्थूल शरीर भी मुक्ति प्राप्त करता है। सिद्धदेह की प्राप्ति के लिए अमृतसाधन भी नाथों को स्वीकार्य है। रस (पारद + अभ्रक) से सिद्धदेह की प्राप्ति की निन्दा गोरक्ष ने अपनी हिन्दी रचनाओं में की है, क्योंकि उससे वास्तविक स्थिर सिद्धदेह की प्राप्ति नहीं होती। गोरक्ष साधन में लोग वज्रोली, सहजोली आदि की भी गणना करते हैं। किन्तु सारी सामग्री की छानबीन करने पर ऐसा संगत प्रतीत नहीं होता कि गोरक्ष ने उनको अपने साधन में स्थान दिया होगा अथवा उनका प्रचार किया होगा। इस प्रकार गोरक्षनाथ की दर्शन और साधना की परम्परा भारतीय वैदिक परम्परा से भिन्न है। दार्शनिक और साधनात्मक दृष्टि से विचार कर डा० गोपीनाथ कविराज ने श्री अक्षयकुमार बनर्जी के ‘फिलासफी आफ गोरक्षनाथ’ नामक ग्रन्थ की प्रस्तावना में कहा है कि नाथों की योगसाधना का आदर्श पातंजल योग से ही तत्त्वतः भिन्न नहीं है, प्रत्युत् पूर्ववर्ती और परवर्ती बौद्ध मतवादों के साथ ही वह बहुत दूर तक शांकर वेदान्त से भी भिन्न है। प्राचीन और मध्यकालीन आगमानुयायी अद्वैतवादी मतवादों से इस नाथा- दर्श की पर्याप्त समानता है जिसे ‘सामरस्य’ कहा गया है। इसी प्रकार नाथसिद्धों की पिण्डसिद्धि और पातंजल कायसंपत् में भी पूर्ण साम्य नहीं है। नाथों का आदर्श है पिण्डसिद्धि से जीवन्मुक्ति प्राप्त करना। तत्पश्चात् समरसीकरण के द्वारा परामुक्ति के आदर्श को वे स्वीकार करते हैं। अतः अब इस निर्देश के प्रकाश में नाथ- साधन और दर्शन के विचार की नई आवश्यकता स्पष्ट हो गयी है। —नागेन्द्रनाथ उपाध्याय
स्वयंबोध अमनस्कयोग१ अमनस्कखण्ड२ प्रथमाध्याय३ कैलासशिखरासीनं सर्वज्ञं सर्वगं शिवम्४। वामदेवो मुनिश्रेष्ठः प्रणम्य परिपृच्छति ॥ १ ॥ मुनिश्रेष्ठ वामदेव जी ने कैलास पर्वत के शिखर पर बैठे हुए सर्वज्ञ सर्व- व्यापी भगवान् शिवजी को प्रणाम कर पूछा ॥ १ ॥ वामदेव उवाच- देवदेव महादेव सर्वानुग्रहकारक५ । जीवन्मुक्तिप्रदोपायं कथयस्व मम प्रभो ॥ २ ॥ वामदेव जी ने कहा—सब पर अनुग्रह करनेवाले देवाधिदेव हे महादेव जी ! हे प्रभो ! जीवन्मुक्ति प्रदान करनेवाला उपाय मुझसे कहने की कृपा कीजिये ॥ २ ॥ १. (ख) अमनस्क योगशास्त्र । २. (ख) नहीं है । ३. (ख) नहीं है । ४. (ख) नहीं है । ५. (ख) प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरुमापतिम् । जीवन्मुक्तिप्रदोपायं कथयस्वेति पृच्छति ।
[ २ ] श्रीमहादेव उवाचः- श्रृणु वत्स महाप्राज्ञ संसारार्णवतारकम् । अगम्यं सर्ववेदानां गोपितं सकलागमे ॥ ३ ॥ तदहं संप्रवक्ष्यामि तव संवीक्ष्य वासनाम् । अद्वैतं परमं चापि तव भक्तिरहैतुकी ॥ ४ ॥ श्री महादेव जी ने कहा—हे वत्स, हे महामते, ससार सागर से पार करने- वाला जीवन्मुक्तिप्रद उपाय तुम सुनो, यह उपाय सब वेदों का अगम्य है, सब आगमों में छिपाकर रखा हुआ है। तुम्हारी उत्कट अभिलाषा एवं परम अद्वैत देखकर मैं तुमसे कहूंगा, क्योंकि तुम्हारी भक्ति अहैतुकी है ॥३॥४॥ अस्त्येकस्तारको योगः सर्वयोगोत्तमोत्तमः । स एव द्विविधः प्रोक्तः पूर्वापर विभागतः ॥ ५ ॥ सब योगों में परमोत्तम एक "तारक योग" है। वही "पूर्व" और "अपर" विभाग से दो प्रकार का कहा गया है ॥ ५ ॥ पूर्वोक्तस्तारकस्तत्र अमनस्कस्तथापरः । प्रथमं तु प्रवक्ष्यामि पूर्वमङ्ग समासतः ॥ ६ ॥ उन योगों में 'पूर्व' जो कहा गया है उसका नाम "तारकयोग" है और "अपर" जो कहा गया है वह "अमनस्क योग" है। पहले मैं अंगभूत 'पूर्व' योग अर्थात् "तारक योग" को संक्षेप में कहूंगा ॥ ६ ॥ सर्वमूर्तिमयं रूपं गुणैरिन्द्रियमानदम् । द्विधा कृतं मनोयुक्तं तारकं सर्वसारकम् ॥ ७ ॥ सर्वमूर्तिमय, गुणों से इन्द्रियों को रुचिकर योग स्वरूप दो प्रकार का किया गया है। उनमें मन से युक्त जो योगस्वरूप है वह 'तारक' कहलाता है और मन से अतीत जो योगस्वरूप है वह सर्वसार 'अमनस्क' कहा जाता है ॥ ७ ॥ १. (ख) ईश्वर उवाच । परं ज्ञानमहं वच्मि येन तत्त्वं प्रकाशते । येन विच्छिद्यते सर्वमाशापाशादि बन्धनम् ॥ २२ ॥
[ ३ ] तारे ज्योतिषि संयोज्य किञ्चिदुन्नमयन् भ्रुवौ । पूर्वयोगस्य मार्गोऽयमुन्मनीकारकः क्षणात् ॥ ८ ॥१ तारों ( आंख की पुतलियों ) को ज्योति में लगा कर भौंहो को कुछ ऊंची करे ( चढ़ा ले ) । यह पूर्वयोग ( तारकयोग ) का मार्ग क्षणभर में उन्मनी- भाव को उत्पन्न करता है ॥ ८ ॥ एष योगो मया प्रोक्तः पूर्वापरविभागतः । सर्वमंगल सिद्धार्थं न देयो यस्य कस्यचित् ॥ ६ ॥२ इस योग का पूर्वयोग और अपरयोग के विभाग से सब कल्याणों की सिद्धि के लिए मैंने प्रतिपादन किया है। इसे जिस किसीको योग्यता का विचार किये बिना नहीं देना चाहिये ॥ ६ ॥ मन्त्रयोगरताः ३ केचित् केचिद् ध्यान विमोहिताः । जपेन केचित् क्लिश्यन्ति नैव जानन्ति तारकम् ॥ १० ॥ कोई लोग मन्त्रयोग की साधना में लगे हुए हैं, कोई ध्यान के मोह में पड़े हुए हैं, कोई जप योगसे क्लेश पा रहे हैं, ये सब तारक योग को नहीं ही जानते हैं ॥ १० ॥ केचिदागमजालेन केचिन्निगमसंकुलैः । केचित्तर्केण मुह्यन्ति नैव जानन्ति तारकम् ॥ ११ ॥ कोई आगम-समुदाय से, कोई निगमराशियों से और कोई तकों से मोहित हैं। ये सब तारक को नहीं ही जानते हैं ॥ ११ ॥ १. गंगायमुनयोर्मध्ये बालरण्डा तपस्विनी । बलात्कारेण गृह्णीयात् तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ हठयोगप्रदीपिका ३ : १०६ के इस श्लोक में उपर्युक्त श्लोक के भावानुसार ही उन्मनी भाव अथवा विष्णु पद का व्याख्यान है। २. ( ख ) श्लोक सं० ५ से ६ तक नहीं है। ३. (ख) 'तन्त्र योगरताः' पाठ है। इसके पूर्व (ख) में- आधारादिषु चक्रेषु सुषुम्णादिषु नाडिषु । प्राणादिषु शरीरेषु परं तत्वं न तिष्ठति ॥ -यह श्लोक है।
[ ४ ] तारको यं भवाम्भोधौ तारणे गुरुशिष्ययोः १ । तारकोन्मेषयुक्तत्वादपि तारक उच्यते ॥ १२ ॥ यह तारक योग भवसागर में गुरु और शिष्य दोनों का तारण करता है। तारिका के उन्मेष२ से युक्त होने के कारण यह “तारक” कहा जाता है ॥१२॥ न मीमांसातर्कग्रह३गणितसिद्धान्तपठनै - र्न वेदैर्वेदान्तैः स्मृतिभिरभिधानैरपि न च । न चापिच्छन्दोव्याकरणकवितालंकृतिगणै४ - र्मुनेस्तद्व्याप्ति५र्निजगुरुमुखादेव विहिता ॥ १३ ॥ मुनि को तारक योग की विशिष्टरूप से प्राप्ति न तो मीमांसा, तर्क (न्याय) तथा फलित, गणित और सिद्धान्तरूप त्रिस्कन्ध ज्योतिष पढ़ने से होती है, न वेद, वेदान्त, स्मृति और कोषों के अनुशीलन से होती है एवं न छन्दःशास्त्र, व्याकरण, काव्य और अलंकारों के अध्ययन से होती है। एकमात्र अपने गुरु के मुखारविन्द से उसकी विशिष्ट प्राप्ति शास्त्रों में कही गई है ॥ १३ ॥ दृष्टिः स्थिरा यस्य विनैव दृश्यं, वायुः स्थिरो यस्य विना प्रयत्नम् । चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बं, स एव योगी स गुरुः स सेव्यः ॥ १४ ॥ दृश्य के बिना ही जिसकी दृष्टि स्थिर हो जाय, विना किसी प्रकार के प्रयत्न के जिसका वायु स्थिर हो जाय एवं विना किसी अवलम्बन के जिसका चित्त स्थिर हो जाय, वही योगी, है वह गुरु होने योग्य है, उसी की सेवा करनी चाहिये ॥ १४ ॥ १. (ख) ११ और १२ वाँ श्लोक नहीं है । २. संसार सागर से उत्तीर्ण करनेवाली शक्ति का जागरण । इस शक्ति को चित्-शक्ति, बोध शक्ति या कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं । ३. (ख) तर्कसंग्रह । ४. (ख) लंकृतिमयै- ५. (ख) तत्वं प्राप्ति ।
गोरक्षासन ( आगेकी बाजू ) ऊर्ध्व पद्मासन शीर्षासन गोरक्षासन ( पीछेकी बाजू )
अर्ध मत्स्येन्द्रासन ( पीछेकी बाजू ) पद्मासन पूर्ण मत्स्येन्द्रासन ( आगेकी बाजू ) कर्णपीडासन
[ ५ ] एवंविधगुरोः१शब्दात् सर्वचिन्ताविवर्जितः । स्थित्वा मनोहरे देशे योगमेव समभ्यसेत् ॥ १५ ॥ इस प्रकार के गुरु के उपदेशानुसार सब प्रकार की चिन्ताओं से रहित होकर सुन्दर प्रदेश में बैठकर योग का ही सम्यक् अभ्यास करना चाहिये ॥१५॥ विविक्तदेशे सुखसंनिविष्टः समासने किञ्चिदुपेत्य पश्चात् । बाहुप्रमाणं स्थिरदृक् स्थिराङ्ग- श्चिन्ताविहीनोऽभ्यसनं कुरुष्व ॥ १६ ॥ सब प्रकार की चिन्ताओं से रहित हो एकान्त स्थान में सम आसन पर कुछ पीछे की ओर झुक कर यानी तन कर स्थिर अंग हो सुख पूर्वक बैठ कर एक हाथ तक स्थिर दृष्टिकर योग का अभ्यास करो ॥ १६ ॥ एवमभ्यसतो योगं मनो भवति सुस्थिरम् । वायुवाक्कायदृष्टीनां स्थिरता च तथा तथा ॥ १७ ॥ इस प्रकार योग का सभ्यास करते करते मन सुस्थिर हो जाता है, क्रमशः वायु, वाणी, देह और दृष्टि में भी स्थिरता आ जाती है ॥ १७ ॥ जायमानामनस्कस्य उदासीनस्य सर्वतः । मृदुत्वं च लघुत्वं च शरीरस्योपजायते ॥ १८ ॥ जिसको अमनस्क योग की प्राप्ति हो रही हो और जो सब ओर से उदासीन हो ऐसे योगी के शरीर में मृदुता ( कोमलता ) लघुत्व ( हल्कापन ) हो जाता है ॥ १८ ॥ १. ऐसे सद्गुरु के विषयमें हठयोगप्रदीपिका में लिखा है कि— “दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥
[ ६ ] काषायग्रहणं कपालधरणं केशावलीलुंचनं¹। पाखण्डव्रतभस्मचीवरजटाधारित्वमुन्मत्तता ॥ नग्नत्वं निगमागमादिकवितागोष्ठीसभाभ्यन्तरे, सर्वं चोदरपूरणाय² पठनं न श्रेयसः कारणम् ॥ १६ ॥ काषाय ( गेरुवे ) वस्त्र धारण करना, खप्पर धारण करना, केशों को नोचना, पाखण्डव्रत लेना, भस्म, कन्था और जटा धारण करना, उन्मत्तवत् रहना, नग्न रहना, सभाओं में निगम और आगमों पर व्याख्यान झाड़ना, काव्य गोष्ठी में भाग लेना यह उदरपूर्ति के लिए है। पढ़ना निःश्रेयस् का साधन नहीं है। अर्थात् पठन से निःश्रेयस् की प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ १६ ॥ ³द्वेषोच्चाटनमारणादि कुहकैर्मन्त्रैः प्रपंचोद्गमः⁴ सर्वाभ्यास⁵ विचित्रदन्धकरणाद्यज्ञानयोगः परः⁶। ध्यानं देहपदेषु नाडिषु षडाधारे च चेतोभ्रम- स्तस्मात् तत्सकलं मनोविरचितं त्यक्त्वाऽमनस्कं भज ॥२०॥ द्वेष ( विद्वेषण ), उच्चाटन, मारण आदि प्रवचनाओं से युक्त मन्त्रों से प्रपंच की उत्पत्ति होती है, पूर्ण अभ्यास, भाँति भाँति के आसनबन्धों का करना केवल अज्ञान ही ह, देहस्थित नाड़ियों में तथा षडाधार चक्रों में ध्यान केवल चित्त का विभ्रम है, इसलिए मन से कल्पित इन सब का त्याग कर अमनस्क का सेवन करो ॥ २० ॥ १. (ख) मुंचनं । यही पाठ अच्छा प्रतीत होता है। उसका अर्थ होगा केशों का त्याग अर्थात् मुण्डित होना । २. (ख) पूरणार्थपठनम् । ३. (ख) रक्षोच्चाटन । ४. (ख) मन्त्रप्रपंचोद्गमैः । ५. (क) पूर्णाभ्यास । ६. (क) अज्ञानबोधिः परम् (ख) अज्ञानभोगः परः ।