अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ६ ] काषायग्रहणं कपालधरणं केशावलीलुंचनं¹। पाखण्डव्रतभस्मचीवरजटाधारित्वमुन्मत्तता ॥ नग्नत्वं निगमागमादिकवितागोष्ठीसभाभ्यन्तरे, सर्वं चोदरपूरणाय² पठनं न श्रेयसः कारणम् ॥ १६ ॥ काषाय ( गेरुवे ) वस्त्र धारण करना, खप्पर धारण करना, केशों को नोचना, पाखण्डव्रत लेना, भस्म, कन्था और जटा धारण करना, उन्मत्तवत् रहना, नग्न रहना, सभाओं में निगम और आगमों पर व्याख्यान झाड़ना, काव्य गोष्ठी में भाग लेना यह उदरपूर्ति के लिए है। पढ़ना निःश्रेयस् का साधन नहीं है। अर्थात् पठन से निःश्रेयस् की प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ १६ ॥ ³द्वेषोच्चाटनमारणादि कुहकैर्मन्त्रैः प्रपंचोद्गमः⁴ सर्वाभ्यास⁵ विचित्रदन्धकरणाद्यज्ञानयोगः परः⁶। ध्यानं देहपदेषु नाडिषु षडाधारे च चेतोभ्रम- स्तस्मात् तत्सकलं मनोविरचितं त्यक्त्वाऽमनस्कं भज ॥२०॥ द्वेष ( विद्वेषण ), उच्चाटन, मारण आदि प्रवचनाओं से युक्त मन्त्रों से प्रपंच की उत्पत्ति होती है, पूर्ण अभ्यास, भाँति भाँति के आसनबन्धों का करना केवल अज्ञान ही ह, देहस्थित नाड़ियों में तथा षडाधार चक्रों में ध्यान केवल चित्त का विभ्रम है, इसलिए मन से कल्पित इन सब का त्याग कर अमनस्क का सेवन करो ॥ २० ॥ १. (ख) मुंचनं । यही पाठ अच्छा प्रतीत होता है। उसका अर्थ होगा केशों का त्याग अर्थात् मुण्डित होना । २. (ख) पूरणार्थपठनम् । ३. (ख) रक्षोच्चाटन । ४. (ख) मन्त्रप्रपंचोद्गमैः । ५. (क) पूर्णाभ्यास । ६. (क) अज्ञानबोधिः परम् (ख) अज्ञानभोगः परः ।