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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

[ ७ ] अन्ये च जगतो भावा ये च तिष्ठन्त्यनेकधाः। तेषां तु लक्षकेणापि परतत्त्वं न मीयते¹ ॥ २१ ॥ और भी जगत् के जो विविध प्रकार के पदार्थ हैं उनके लक्ष से भी परम तत्त्व की बराबरी नहीं की जा सकती। अर्थात् उनकी लाख लाख संख्या से भी पर तत्त्व की समता नहीं की जा सकती, क्योंकि जागतिक पदार्थों में और परतत्त्व में अत्यन्त विलक्षणता है। मूल में 'परतत्त्वं न गीयते' यह पाठ मानने पर 'लाखों जागतिक पदार्थों से परतत्त्व का निरूपण नहीं किया जा सकता' यह अर्थ होगा ॥ २१ ॥ अथाहं वच्मि मोक्षाय ज्ञानरागजितां² नृणाम्। निष्कलं निष्प्रपञ्चं च³ परतत्त्वं तदुच्यते ॥ २२ ॥ अब मैं ज्ञान से राग पर विजय प्राप्त करनेवाले लोगों की मुक्ति के लिये परतत्त्व का निरूपण करता हूँ। निष्कल और निष्प्रपंच जो तत्त्व है वह परतत्त्व कहा जाता है ॥ २२ ॥ यस्मादुत्पद्यते सर्वं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्। यस्मिन् विलीयते सर्वं परतत्त्वं⁴ तदुच्यते ॥ २३ ॥ जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है, जिसमें सब स्थित हैं और जिसमें सब लीन होते हैं वह "पर तत्त्व" कहा जाता है ॥ २३ ॥ भावाभावविनिर्मुक्तं विनाशोत्पत्तिवर्जितम्। सर्वसंकल्पनातीतं परतत्त्वं⁵ तदुच्यते ॥ २४ ॥ सत् (अस्ति), असत् (नास्ति), सदसत् (अस्तिनास्ति) और असत्- असत् (नास्तिनास्ति) इस चतुष्कोटि से विनिर्मुक्त, विनाश और उत्पत्ति से रहित एवं सर्व कल्पनाओं से अतीत जो तत्त्व है वह "परतत्त्व" कहा जाता है ॥ २४ ॥ १. (ख) तेषां तु लक्षणेनापि परं तत्त्वं न गीयते। (क) परतत्त्वं न गीयते । २. (ख) ज्ञानं रागजिताम् । ३. (ख) निष्प्रपंचं यत् परं तत्त्वं । ४. (ख) परं तत्त्वं तदुच्यते । ५. (ख) परं तत्त्वं तदुच्यते ।