अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ८ ] अनाकारमविच्छिन्नमग्राह्यमचलं ध्रुवम् । सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सर्वकामविवर्जितम् ॥ २५ ॥ परम तत्त्व निराकार, अविच्छिन्न अर्थात् जन्म, मरण आदि से रहित अर्थात् शाश्वत, मन और वाणी का अगम्य, निश्चल, अविनश्वर, सब उपा- धियों से रहित एवं सब कामनाओं से शून्य है ॥ २५ ॥ प्रथमं पृथिवीतत्त्वं जलतत्त्वं द्वितीयकम् । तेजस्तत्त्वं तृतीयं च¹ वायुतत्त्वं चतुर्थकम् ॥ २६ ॥ आकाशं पंचमं तत्त्वं मनः षष्ठमुदीरितम् । सप्तमं परमं तत्त्वं यो जानाति स मोक्षभाक् ॥ २७ ॥ पहला पृथिवी तत्त्व कहा गया है, दूसरा जलतत्त्व, तीसरा तेजस्तत्त्व, चौथा वायुतत्त्व, पाँचवाँ आकाश तत्त्व, एवं छठाँ मनस्तत्त्व कहा गया है । सातवाँ परम तत्त्व है उसे जो जानता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ २६ ।: २७ ॥ परं तत्त्वं समाख्यातं जन्मबन्धविनाशनम् । तस्याभ्यासं प्रवक्ष्यामि येन संजायते लयः ॥ २८ ॥ “परतत्त्व” जन्मरूप बन्धन का विनाशक कहा गया है। मैं उसके अभ्यास की विधि बतलाऊंगा जिससे लय होता है ॥ २८ ॥ विविक्तदेशे सुखसंनिविष्टः समासने किंचिदुपेत्य पश्चात् । बाहुप्रमाणं स्थिरदृक् स्थिरांग- श्चिन्ताविहीनोऽभ्यसनं² कुरुष्व ॥२६॥³ निर्जन और पवित्र स्थान में सम आसन पर कुछ पीछे की ओर झुक कर अर्थात् तन कर सुख से बैठे हुए तुम एक हाथ दूर तक दृष्टि को स्थिर कर निश्चल शरीर और चिन्ताविहीन होकर उस परमतत्त्व का अभ्यास करो ॥ २६ ॥ १. (ख) स्यात् । २. (ख) स्थिरांगं । ३. श्लोक १६ की यहाँ पर जो पुनरावृत्ति हुई है इसका कारण आसन के पश्चात् ही ध्यान की प्रक्रिया द्वारा अमनस्क योग का निरूपण करना है ।