अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५ ] एवंविधगुरोः१शब्दात् सर्वचिन्ताविवर्जितः । स्थित्वा मनोहरे देशे योगमेव समभ्यसेत् ॥ १५ ॥ इस प्रकार के गुरु के उपदेशानुसार सब प्रकार की चिन्ताओं से रहित होकर सुन्दर प्रदेश में बैठकर योग का ही सम्यक् अभ्यास करना चाहिये ॥१५॥ विविक्तदेशे सुखसंनिविष्टः समासने किञ्चिदुपेत्य पश्चात् । बाहुप्रमाणं स्थिरदृक् स्थिराङ्ग- श्चिन्ताविहीनोऽभ्यसनं कुरुष्व ॥ १६ ॥ सब प्रकार की चिन्ताओं से रहित हो एकान्त स्थान में सम आसन पर कुछ पीछे की ओर झुक कर यानी तन कर स्थिर अंग हो सुख पूर्वक बैठ कर एक हाथ तक स्थिर दृष्टिकर योग का अभ्यास करो ॥ १६ ॥ एवमभ्यसतो योगं मनो भवति सुस्थिरम् । वायुवाक्कायदृष्टीनां स्थिरता च तथा तथा ॥ १७ ॥ इस प्रकार योग का सभ्यास करते करते मन सुस्थिर हो जाता है, क्रमशः वायु, वाणी, देह और दृष्टि में भी स्थिरता आ जाती है ॥ १७ ॥ जायमानामनस्कस्य उदासीनस्य सर्वतः । मृदुत्वं च लघुत्वं च शरीरस्योपजायते ॥ १८ ॥ जिसको अमनस्क योग की प्राप्ति हो रही हो और जो सब ओर से उदासीन हो ऐसे योगी के शरीर में मृदुता ( कोमलता ) लघुत्व ( हल्कापन ) हो जाता है ॥ १८ ॥ १. ऐसे सद्गुरु के विषयमें हठयोगप्रदीपिका में लिखा है कि— “दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥