अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३५ ] कहा गया है । पिण्ड-ब्रह्माण्ड-एकत्व का सिद्धान्त इस साधन का ही सिद्धांत पक्ष है । गोरख-मत के मान्य चक्रों की कुछ निश्चित संख्या नहीं बतायी जा सकती । फिर भी तांत्रिकों के कुल सात चक्र अधि- कांशतः और सामान्यतः स्वीकृत हैं ।⁷⁶ सिद्धसिद्धान्तपद्धति में कहा गया है कि ध्यान परमाद्वैतभाव है । जिन-जिन तत्वों या पदार्थों का स्फुरण होता है, आत्मा उनकी अपने ही स्वरूप के अनुसार भावना करती है । इस प्रकार ध्यान में सभी भूतों में समदृष्टि हो जाती है । इस ध्यान-साधन में चित्त पूर्ण- रूप से निश्चल रहता है । सगुण और निर्गुण नामक दो प्रकार के ध्यान बताये गये हैं । सगुण ध्यान विभिन्न वर्णों (रंगों) वाला होता है तथा निर्गुण ध्यान केवल ज्ञानात्मक, अनुभृत्यात्मक । स्थूल और सूक्ष्म भेद से भी ध्यान दो प्रकार का होता है । स्थूल ध्यान के बाद तेजोध्यान या ज्योतिर्ध्यान और सूक्ष्म ध्यान का वर्णन किया गया है ।⁷⁷ समाधि में सभी तत्वों की सम-अवस्था रहती है, निरू- द्यमत्व और अनायास की स्थिति रहती है । इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है जिसमें शुभ-अशुभ कार्यों का त्याग हो जाता है, विश्वतो- मुख अनन्त परम ज्योति का साक्षात्कार होता है । जब प्राण सम्यक् प्रकार से क्षीण हो जाते हैं तथा मानस भी लय को प्राप्त हो जाता है, जब समरसत्व की प्राप्ति हो जाती है, तब कहा जाता है कि समाधि की अवस्था प्राप्त हो गयी । इस समय अपना - पराया कुछ भी नहीं रहता । हठयोगप्रदीपिका में इस स्थिति के विभिन्न नाम बताये गये हैं : राजयोग, समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमरत्व, लय, तत्व, शून्याशून्य, परमपद, अमनस्क, अद्वैत, निरालम्ब, निरं- जन, जीवन्मुक्ति, सहजा, तुर्या । इन शब्दों की अलग-अलग विस्तृत व्याख्याएं मिलती हैं ।⁷⁸ इस प्रकार गोरख के षडंग-योग के दो उद्देश्य बताये गये हैं । ७६. नाथ और संत साहित्य—पृ० २८८-२६६ ७७. सि० सि० प०-२.३८; योगमार्तण्ड-१०२, १५७; गो० प०-२.६५-७५; योगमार्तण्ड-१५६-१६६; घेरण्डसंहिता-६.२-२२ । ७८. नाथ और संत साहित्य--पृ० २६७-२६८ ।