अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३६ ] प्रथम गौण उद्देश्य है सिद्धदेह या दिव्यदेह की प्राप्ति या जीवन्मुक्ति। दूसरा मुख्य उद्देश्य है द्वैताद्वैत-विवर्जित नाथरूप में अवस्थान या पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण। संस्कृत-ग्रन्थों के आधार पर उपस्थित किये गये इस गोरक्ष-योग में दो प्रधान साधन हैं : हठयोग और लययोग। इसी प्रकार दो कार्य हैं:—विन्दुरक्षा और नादानुसंधान। गोरक्ष योगसाधना का मुख्य तत्व है प्राणायाम। दोनों कार्य इसी से साधित होते हैं। इसी आधार पर नाथ लोगों का यह भी कथन है कि यह स्थूल शरीर भी मुक्ति प्राप्त करता है। सिद्धदेह की प्राप्ति के लिए अमृतसाधन भी नाथों को स्वीकार्य है। रस (पारद + अभ्रक) से सिद्धदेह की प्राप्ति की निन्दा गोरक्ष ने अपनी हिन्दी रचनाओं में की है, क्योंकि उससे वास्तविक स्थिर सिद्धदेह की प्राप्ति नहीं होती। गोरक्ष साधन में लोग वज्रोली, सहजोली आदि की भी गणना करते हैं। किन्तु सारी सामग्री की छानबीन करने पर ऐसा संगत प्रतीत नहीं होता कि गोरक्ष ने उनको अपने साधन में स्थान दिया होगा अथवा उनका प्रचार किया होगा। इस प्रकार गोरक्षनाथ की दर्शन और साधना की परम्परा भारतीय वैदिक परम्परा से भिन्न है। दार्शनिक और साधनात्मक दृष्टि से विचार कर डा० गोपीनाथ कविराज ने श्री अक्षयकुमार बनर्जी के ‘फिलासफी आफ गोरक्षनाथ’ नामक ग्रन्थ की प्रस्तावना में कहा है कि नाथों की योगसाधना का आदर्श पातंजल योग से ही तत्त्वतः भिन्न नहीं है, प्रत्युत् पूर्ववर्ती और परवर्ती बौद्ध मतवादों के साथ ही वह बहुत दूर तक शांकर वेदान्त से भी भिन्न है। प्राचीन और मध्यकालीन आगमानुयायी अद्वैतवादी मतवादों से इस नाथा- दर्श की पर्याप्त समानता है जिसे ‘सामरस्य’ कहा गया है। इसी प्रकार नाथसिद्धों की पिण्डसिद्धि और पातंजल कायसंपत् में भी पूर्ण साम्य नहीं है। नाथों का आदर्श है पिण्डसिद्धि से जीवन्मुक्ति प्राप्त करना। तत्पश्चात् समरसीकरण के द्वारा परामुक्ति के आदर्श को वे स्वीकार करते हैं। अतः अब इस निर्देश के प्रकाश में नाथ- साधन और दर्शन के विचार की नई आवश्यकता स्पष्ट हो गयी है। —नागेन्द्रनाथ उपाध्याय