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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

[ ३ ] तारे ज्योतिषि संयोज्य किञ्चिदुन्नमयन् भ्रुवौ । पूर्वयोगस्य मार्गोऽयमुन्मनीकारकः क्षणात् ॥ ८ ॥१ तारों ( आंख की पुतलियों ) को ज्योति में लगा कर भौंहो को कुछ ऊंची करे ( चढ़ा ले ) । यह पूर्वयोग ( तारकयोग ) का मार्ग क्षणभर में उन्मनी- भाव को उत्पन्न करता है ॥ ८ ॥ एष योगो मया प्रोक्तः पूर्वापरविभागतः । सर्वमंगल सिद्धार्थं न देयो यस्य कस्यचित् ॥ ६ ॥२ इस योग का पूर्वयोग और अपरयोग के विभाग से सब कल्याणों की सिद्धि के लिए मैंने प्रतिपादन किया है। इसे जिस किसीको योग्यता का विचार किये बिना नहीं देना चाहिये ॥ ६ ॥ मन्त्रयोगरताः ३ केचित् केचिद् ध्यान विमोहिताः । जपेन केचित् क्लिश्यन्ति नैव जानन्ति तारकम् ॥ १० ॥ कोई लोग मन्त्रयोग की साधना में लगे हुए हैं, कोई ध्यान के मोह में पड़े हुए हैं, कोई जप योगसे क्लेश पा रहे हैं, ये सब तारक योग को नहीं ही जानते हैं ॥ १० ॥ केचिदागमजालेन केचिन्निगमसंकुलैः । केचित्तर्केण मुह्यन्ति नैव जानन्ति तारकम् ॥ ११ ॥ कोई आगम-समुदाय से, कोई निगमराशियों से और कोई तकों से मोहित हैं। ये सब तारक को नहीं ही जानते हैं ॥ ११ ॥ १. गंगायमुनयोर्मध्ये बालरण्डा तपस्विनी । बलात्कारेण गृह्णीयात् तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ हठयोगप्रदीपिका ३ : १०६ के इस श्लोक में उपर्युक्त श्लोक के भावानुसार ही उन्मनी भाव अथवा विष्णु पद का व्याख्यान है। २. ( ख ) श्लोक सं० ५ से ६ तक नहीं है। ३. (ख) 'तन्त्र योगरताः' पाठ है। इसके पूर्व (ख) में- आधारादिषु चक्रेषु सुषुम्णादिषु नाडिषु । प्राणादिषु शरीरेषु परं तत्वं न तिष्ठति ॥ -यह श्लोक है।