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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ २ ] श्रीमहादेव उवाचः- श्रृणु वत्स महाप्राज्ञ संसारार्णवतारकम् । अगम्यं सर्ववेदानां गोपितं सकलागमे ॥ ३ ॥ तदहं संप्रवक्ष्यामि तव संवीक्ष्य वासनाम् । अद्वैतं परमं चापि तव भक्तिरहैतुकी ॥ ४ ॥ श्री महादेव जी ने कहा—हे वत्स, हे महामते, ससार सागर से पार करने- वाला जीवन्मुक्तिप्रद उपाय तुम सुनो, यह उपाय सब वेदों का अगम्य है, सब आगमों में छिपाकर रखा हुआ है। तुम्हारी उत्कट अभिलाषा एवं परम अद्वैत देखकर मैं तुमसे कहूंगा, क्योंकि तुम्हारी भक्ति अहैतुकी है ॥३॥४॥ अस्त्येकस्तारको योगः सर्वयोगोत्तमोत्तमः । स एव द्विविधः प्रोक्तः पूर्वापर विभागतः ॥ ५ ॥ सब योगों में परमोत्तम एक "तारक योग" है। वही "पूर्व" और "अपर" विभाग से दो प्रकार का कहा गया है ॥ ५ ॥ पूर्वोक्तस्तारकस्तत्र अमनस्कस्तथापरः । प्रथमं तु प्रवक्ष्यामि पूर्वमङ्ग समासतः ॥ ६ ॥ उन योगों में 'पूर्व' जो कहा गया है उसका नाम "तारकयोग" है और "अपर" जो कहा गया है वह "अमनस्क योग" है। पहले मैं अंगभूत 'पूर्व' योग अर्थात् "तारक योग" को संक्षेप में कहूंगा ॥ ६ ॥ सर्वमूर्तिमयं रूपं गुणैरिन्द्रियमानदम् । द्विधा कृतं मनोयुक्तं तारकं सर्वसारकम् ॥ ७ ॥ सर्वमूर्तिमय, गुणों से इन्द्रियों को रुचिकर योग स्वरूप दो प्रकार का किया गया है। उनमें मन से युक्त जो योगस्वरूप है वह 'तारक' कहलाता है और मन से अतीत जो योगस्वरूप है वह सर्वसार 'अमनस्क' कहा जाता है ॥ ७ ॥ १. (ख) ईश्वर उवाच । परं ज्ञानमहं वच्मि येन तत्त्वं प्रकाशते । येन विच्छिद्यते सर्वमाशापाशादि बन्धनम् ॥ २२ ॥