अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४ ] तारको यं भवाम्भोधौ तारणे गुरुशिष्ययोः १ । तारकोन्मेषयुक्तत्वादपि तारक उच्यते ॥ १२ ॥ यह तारक योग भवसागर में गुरु और शिष्य दोनों का तारण करता है। तारिका के उन्मेष२ से युक्त होने के कारण यह “तारक” कहा जाता है ॥१२॥ न मीमांसातर्कग्रह३गणितसिद्धान्तपठनै - र्न वेदैर्वेदान्तैः स्मृतिभिरभिधानैरपि न च । न चापिच्छन्दोव्याकरणकवितालंकृतिगणै४ - र्मुनेस्तद्व्याप्ति५र्निजगुरुमुखादेव विहिता ॥ १३ ॥ मुनि को तारक योग की विशिष्टरूप से प्राप्ति न तो मीमांसा, तर्क (न्याय) तथा फलित, गणित और सिद्धान्तरूप त्रिस्कन्ध ज्योतिष पढ़ने से होती है, न वेद, वेदान्त, स्मृति और कोषों के अनुशीलन से होती है एवं न छन्दःशास्त्र, व्याकरण, काव्य और अलंकारों के अध्ययन से होती है। एकमात्र अपने गुरु के मुखारविन्द से उसकी विशिष्ट प्राप्ति शास्त्रों में कही गई है ॥ १३ ॥ दृष्टिः स्थिरा यस्य विनैव दृश्यं, वायुः स्थिरो यस्य विना प्रयत्नम् । चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बं, स एव योगी स गुरुः स सेव्यः ॥ १४ ॥ दृश्य के बिना ही जिसकी दृष्टि स्थिर हो जाय, विना किसी प्रकार के प्रयत्न के जिसका वायु स्थिर हो जाय एवं विना किसी अवलम्बन के जिसका चित्त स्थिर हो जाय, वही योगी, है वह गुरु होने योग्य है, उसी की सेवा करनी चाहिये ॥ १४ ॥ १. (ख) ११ और १२ वाँ श्लोक नहीं है । २. संसार सागर से उत्तीर्ण करनेवाली शक्ति का जागरण । इस शक्ति को चित्-शक्ति, बोध शक्ति या कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं । ३. (ख) तर्कसंग्रह । ४. (ख) लंकृतिमयै- ५. (ख) तत्वं प्राप्ति ।