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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं पं. गोपीनाथ कविराज लिखित विस्तृत दार्शनिक भूमिका

अमनस्क योग गोरक्षनाथ विरचित नाथ सम्प्रदाय

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महायोगी श्री गोरक्षनाथ विरचित नाथसंप्रदाय का अप्रकाशित अपूर्व ग्रन्थ अमनस्क योग सम्पादक एवं टीकाकार श्री योगनाथ स्वामी प्रस्तावना महामहोपाध्याय डॉ० गोपीनाथ कविराज (एम० ए०, डी० लिट्०, पद्मभूषण, साहित्यवाचस्पति, सर्वतंत्र सार्वभौम) सिद्ध साहित्य संशोधन प्रकाशन मंडल, पूना

प्रकाशक : श्री रवीन्द्र जनार्दन भेलहे, सिद्ध साहित्य संशोधन प्रकाशन मंडल, 'श्री' भवन, ४८४/३४ पर्वती, पूना-६ ( महाराष्ट्र )। प्रथम संस्करण : ११०० प्रतियाँ मूल्य : 24/0 विक्रम संवत् २०२४ ( १६६७ ई० ) सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन प्राप्ति स्थान : (१) विश्वविद्यालय प्रकाशन, भैरवनाथ, वाराणसी । (२) श्री जी० एच० रावल, एडवोकेट, कांगरा भवन, २३२, डा० एनी बेसेंट रोड, वर्ली, बम्बई-१८ । (३) श्री सुशीलकुमार गांगुली, सॉलीसीटर, १४/१, सुबर्बन पार्क रोड, हवड़ा-१, कलकत्ता । (४) श्री राजनारायण, बैरिस्टर, ए १०७, डिफेंस कालोनी, नई दिल्ली । (५) श्री मधुकर निखल, एडवोकेट, ६५, महात्मा गांधी रोड, पूना कैम्प, महाराष्ट्र । मुद्रक : श्रीकृष्ण मुद्रणालय, दारानगर, वाराणसी-१ ।

समर्पण सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के पोषक धर्मनिष्ठ कैलाशवासी सेठ श्री आनन्दराम जयपुरिया ( स्वदेशी कॉटन मिल्स, कानपुर ) को स्मृति में

समर्पण कैलास वासिनी पूज्य माता जी की पुण्य स्मृति में सप्रेम हठयोगाचार्य योगीराज मत्स्येन्द्रनाथ जी के शिष्य ( गुरु गोरखनाथ जी ) के श्री चरणों में

यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिंल्लोके स्वहितम् । तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षिते ॥ यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि ॥ [ऋग्वेद-६/११३/७, ११ ] हे पवित्र करनेवाले देव, मुझे उस लोक में, दिव्य भाव में स्थित कर, जहाँ सदा प्रकाश ही प्रकाश विद्यमान है, जहाँ अंधकार से प्रकाश की ओर गति नहीं होती, अपितु एक प्रकाश से पूर्णतर प्रकाश की ओर गति होती है, जहाँ दुःख से सुख की ओर गति नहीं है, अपितु एक आनंद से पूर्णतर आनंद की ओर गति होती है, जहाँ मृत्यु से अम- रत्व की ओर गति नहीं है, किन्तु सदा अमरत्व ही अमरत्व विद्यमान है, जहाँ उच्चतम लक्ष्य सदैव प्राप्त रहता है।

अ नु क्र म संपादकीय ७-१५ प्रस्तावना १७-२२ —डॉ० गोपीनाथ कविराज योगिराज गोरक्षनाथ : जीवन, साधना और दर्शन १-३६ —डॉ० नागेन्द्रनाथ उपाध्याय वंदना २३ अमनस्क योग ( मूल और टीका ) १-५१ —श्री योगनाथ स्वामी

[ २ ] सम्पादकीय सिद्ध साहित्य प्रकाशन द्वारा नाथ संप्रदाय का अभी तक अप्रकाशित "अमनस्क योग" नामक यह द्वितीय पुष्प¹ प्रकाशित हो रहा है। इससे मुझे एवं योगसाधन में अभिरुचि रखनेवाले लोगों को हर्ष होना स्वाभाविक है। नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक महायोगी श्री गोरक्षनाथ जी ने संस्कृत भाषा में कतिपय प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की है जिनमें से निम्नलिखित ग्रन्थ उल्लेख- नीय हैं— अमनस्क, अमरौघशासनम्, सिद्ध-सिद्धान्त-पद्धति, गोरक्ष-सिद्धांत-संग्रह, सिद्ध-सिद्धांत-संग्रह, महार्थमंजरी, विवेक मार्तण्ड, योगमार्तण्ड, गोरक्ष पद्धति, गोरक्ष संहिता, योगबीज इत्यादि। इनके अतिरिक्त बृहद् एवं लघु ग्रन्थ भी हैं, जैसे—योगचिन्तामणि, हठयोग संहिता, श्री नाथसूत्र, योगशास्त्र, चतुश्शीत्यासन, गोरक्ष चिकित्सा, गोरक्षपंचय, गोरक्ष गीता, गोरक्ष कौमुदी, गोरक्ष कल्प इत्यादि। १. "ज्ञानदीपबोध" ( गुरुदत्तात्रेय-गोरक्षनाथ संवाद ) नामक प्रथम पुष्प दो वर्ष पूर्व ही वाराणसी से प्रकाशित हुआ था। उसका प्राप्ति स्थान है-- श्री मधुकर विखल (एडवोकेट), ६५ महात्मा गान्धी रोड, पूना-१।

[ ८ ] कुछ विद्वानों ने अवधूत गीता, प्राणसंकली, योग तारावली या योग सारावली नामक ग्रन्थों को भी श्री गोरक्षनाथ की रचनाएँ माना है। वस्तुतः अवधूतगीता के रचयिता भगवान् श्री दत्तात्रेय हैं जिन्होंने उपदेश (स्वात्म- संवित उपदेश) रूप में उसे श्री कार्तिकस्वामी (सुब्रह्मण्यम् या षण्मुखम्) को सुनाया था। इसकी प्राचीन प्रतियों में प्रत्येक अध्याय के अन्त में एक पुष्पिका है जिसमें लिखा है, "श्री दत्तात्रेय विरचितायाम् अवधूतगीतायाम् संवित्युपदेशोनाम...अध्यायः"। इस ग्रन्थ की चालीस-पचास पूर्व छपी हुई कुछ प्रतियों को देखने पर पता चला है कि प्रारम्भ के कुछ श्लोकों में श्री गोरक्ष- नाथ जी का नाम दिया गया है। किन्तु इन श्लोकों की एवं अवधूतगीता के अन्य श्लोकों की भाषा, छन्द, रचना इत्यादि में भेद प्रतीत होता है जिससे स्पष्ट पता लग जाता है कि प्रारम्भ के कुछ श्लोक किसी विद्वान् द्वारा जोड़े गये हैं और इस ग्रन्थ को नाथ सम्प्रदाय का ग्रन्थ प्रमाणित करने का वृथा प्रयास किया गया है।१ प्राण संकली (प्राण श्रृंखला) नामक ग्रन्थ के रचयिता संतगुरु नानक हैं२ जब कि "योगतारावली" श्रीमद् आद्य शंकराचार्य जी की रचना मानी गयी है। मैं यहाँ पर सम्प्रति इन सबके विषय में आलो- चना करना अप्रासंगिक समझता हूं। उपर्युक्त संस्कृत भाषा के ग्रन्थों में "अमनस्क" का महत्वपूर्ण स्थान है। नाथ संप्रदाय के विषय में अनुसंधान करनेवाले सज्जन मि० ब्रिग्स, डा० मोहन सिंह, डा० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्री अक्षय- कुमार बनर्जी, डा० श्रीमती कल्याणी मल्लिक से लेकर वर्तमान समय के प्रायः सभी अनुसंधानकर्ताओं ने अपने-अपने शोध प्रबन्धों में "अमनस्क" ग्रन्थ का उल्लेख तो किया है किन्तु अप्राप्य होने पर उसका उद्धरण-विवेचन प्रस्तुत नहीं कर पाये हैं। फलस्वरूप महायोगी श्री गोरक्षनाथ जी की योग विषयक विचारधारा का जितना स्पष्ट एवं विस्तीर्ण रूप से अपने ग्रन्थों में आलेखन करना चाहिए था उतना वे नहीं कर पाये हैं। अब इस अद्भुत ग्रन्थ के प्रकाशन से भावी अनुसंधानकर्ता उक्त अपूर्णता को पूर्ण करने में समर्थ होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है। अमनस्क ग्रन्थ का नाम सर्वप्रथम जब मैंने श्रद्धेय महामहोपाध्याय डा० १. अवधूतगीता के कुछ परिवर्तित श्लोक नाथ संप्रदाय के कुछ ग्रन्थों में पाये जाते हैं। २. और भी कई सिद्धों और सन्तों की भी ऐसी रचनायें मिलती हैं।

[ ६ ] श्री गोपीनाथ कविराज, पद्मविभूषण, से सुना तब से ही उसे प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा हुई। तदनुसार राजस्थान, सौराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, नैपाल इत्यादि के नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध स्थानों में उसके विषय में पूछ-ताछ की, किन्तु सभी स्थानों से निराशा ही हासिल हुई। कुछ लोग तो अमनस्क नामक कोई ग्रन्थ है यह बात मानने को भी तैयार नहीं थे। आखिर प्रायः छः वर्षों के कठिन परिश्रम के उपरान्त मुझे मैसूर प्रान्त से कन्नड़ भाषा में इस ग्रन्थ की अपूर्ण एवं कई स्थानों में त्रुटिपूर्ण एक प्रति प्राप्त हुई। एक कन्नड़भाषी सज्जन से कन्नड़ लिपि के श्लोकों को संस्कृत में आबद्ध करवाया और जहाँ कहीं अपूर्णता एवं अशुद्धियां थीं उन्हें श्रीयुत डा० गोपीनाथ कविराज जी की सहायता से दूर किया। इस प्रकार कन्नड़ भाषा की प्रति में से ६८ श्लोक प्राप्त हुए किन्तु इस प्रति के आधार पर अमनस्क के विषय में जो कुछ ज्ञान था वह अपर्याप्त ही था। अब मैंने इस ग्रन्थ के शेष भाग की खोज शुरू कर दी। भारत के कितने ही प्राचीन हस्तलेख संग्रहस्थानों से पत्र-व्यवहार किया। कुछ अगम्य स्थानों में गया भी। इस प्रकार शोध करते-करते आखिर मैं शेष ११३ श्लोकों को प्राप्त कर सका। सब मिलाकर इन २११ श्लोकों को शुद्ध कर, दो खण्डों में व्यवस्थित रूप में रख कर, उनका सरल अनुवाद किया। जहाँ कहीं टिप्पणियों की आवश्यकता प्रतीत हुई वहीं संक्षेप में लिख कर ग्रन्थ रूप में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह सब श्रीयुत गोपीनाथ कविराज जी के मार्गदर्शन से ही सम्पन्न हो सका है जिसके लिए मैं उनका चिरकृतज्ञ हूं। अमनस्क ग्रन्थ के जो दो हस्तलेख मुझे अच्छी हालत में प्राप्त हुए हैं उनमें से ही यहाँ पर पाठभेद दिया जा रहा है। बाद में और जो कुछ जीर्ण अवस्था वाली पोथियाँ मुझे देखने को मिली उनमें उस ग्रन्थ के विभिन्न नाम पाये गये हैं, जैसे—अमनस्क, अमनस्कयोग, अमनस्क योग-शास्त्रम्, अमनस्कखंड, श्री ईश्वर-वामदेव संवाद, स्वयंबोध इत्यादि। अमनस्क ग्रन्थ ईश्वर एवं वामदेव के संवाद रूप में है। मुनिश्रेष्ठ श्री वामदेव जी कैलासपर्वत के शिखर पर पहुँचते है और वहीं पर स्वस्वभाव में स्थित भगवान् श्री कैलासपति शिवजी को श्रद्धाभक्तिपूर्वक प्रणाम कर सरस हृदय एवं जिज्ञासु वृत्ति से जीवन्मुक्ति के उपाय के विषय में प्रश्न करते हैं। मुनिवर की उत्कट ज्ञान-पिपासा एवं अहैतुकी भक्ति देखकर योग-योगीश्वर भगवान् शिव जी उनको तारक योग का रहस्य, योगी गुरु के लक्षण, योग

[ २० ] साधना के लिये उपयुक्त स्थान, योगासन, क्रियायोग, विभूतियों के लक्षण इत्यादि के विषय में प्रकाश देते हैं। "मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा" की उक्ति के अनुसार प्रसंगानुसार वे बहिर्मुखी वृत्तिवाले साधुओं की वेषभूषा, व्यवहार इत्यादि की निंदा भी कर देते हैं जिससे योगमार्ग पर प्रस्थान करने- वाला साधक सावधान रहे। उदरपूर्ति के लिये मारण-उच्चाटनादि मलिन मंत्रों में अभिरुचि को प्रपंच, विभिन्न प्रकार के आसन, बंध, मुद्रादि के अभ्यास में ही सारा समय व्यतीत करने की प्रवृत्ति को अज्ञान, और यहाँ तक कि देहस्थ नाड़ी विशेषांतर्गत षट्चक्रों में ध्यान की क्रिया को चित्त का विश्रम कहते हुए इन सबका परित्याग कर, जागतिक पदार्थों से दूर रहने का और अमनस्क सेवन का उपदेश देते हैं। तत्पश्चात् वे परमतत्त्व का निरूपण करते हैं और उसके बोध के विषय में साधना का रहस्य प्रशस्त करते हुए लयस्थयोगी, लय, लय के प्रकार, लययोग से प्राप्य सिद्धि इत्यादि के विषय में अद्भुत उपदेश देकर अन्त में चेतावनी देते हुए कहते हैं कि परब्रह्म में लीन होने के इच्छुक महापुरुष के लिये ये सिद्धियाँ सर्वनाशकारिणी होती हैं, इस- लिये उन्हें उनकी ओर आकृष्ट नहीं होना चाहिये। लयसाधना द्वारा योगी को परमानन्द की प्राप्ति होने पर अजरत्व एवं अमरत्व दोनों की एक ही साथ में महासिद्धि प्राप्त हो जाती है जिससे महाप्रलय होने पर भी उनका पात नहीं होता। द्वितीय खण्ड या उत्तरार्द्ध में मुनिश्रेष्ठ श्री वामदेव जी भगवान् देवाधि- देव शिवजी से विनीत भाव से प्रार्थना करते हैं कि प्रथम की भाँति ही परमानंद प्रदायक दूसरा उपदेश करने की कृपा करें। इसके प्रत्युत्तर में भगवान् उन्हें तारकयोग एवं अमनस्क योग में भेद, शांभवी मुद्रा का रहस्य, शांभव योग, अमनस्क विद्या और उसकी महिमा गाते हुए बाह्याडंबर की निंदा और अमनस्क के उपाय, प्राप्ति और अमनस्क योगी के लक्षणादि के विषय में अतीव बोधप्रद उपदेश प्रदान करते हैं। इस ग्रन्थ के विषय में मैं यहाँ पर एक महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करना अनुचित नहीं समझता। श्रीयुत कविराज जी से जब मैं इस ग्रन्थ के द्वितीय खंड के १५ वें श्लोक को समझ रहा था तब इसमें एक भारी उलझन पैदा हो गयी। श्लोक बड़ा ही विचित्र होने पर भी उसका शाब्दिक अनुवाद सरल था, किन्तु उसमें से

[ ११ ] कोई ठोस अर्थ नहीं निकलता था । यह देख श्रीयुत कविराज जी भी हैरान रह गये । कुछ समय तक इसके अर्थ के बारे में विचार करने पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह श्लोक ही इस ग्रन्थ का हृदय है अर्थात् अत्यन्त रह- स्यपूर्ण है । इसलिये योग की प्रक्रिया विचित्र शब्दजाल में गुप्त रखी गयी है । मैंने मन ही मन कहा कि इस श्लोक का रहस्य खुलने पर ही इस ग्रन्थ को प्रकाशित करना उचित है, अन्यथा कदापि नहीं । अब इसको बोधगम्य करने के लिये मैंने कई विद्वान्, साधक, साधु-महात्माओं के द्वार खटखटाये, किन्तु निराशा ही हाथ लगी । इसे देख सबकी बुद्धि चकरा जाती थी । यह श्लोक इस प्रकार है— “ऊर्ध्वमुष्टिरधोदृष्टिरूर्ध्वभेदस्तधः शिराः । धरायन्त्रविधानेन जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥ १५ ॥ इसका शाब्दिक अर्थ है—“ऊपर की ओर मुष्टि, नीचे की ओर दृष्टि, ऊपर को भेद और नीचे की ओर सिर कर “धरायन्त्र” की विधि से साधक जीवन्मुक्त होगा ।” इस प्रकार के सरल अर्थ से कुछ भी समझ में नहीं आता । मुष्टि क्या है ? भेद एवं शिर किसे कहते हैं ? धरायन्त्र कौन-सी वस्तु है ? इन सबको यहाँ पर अत्यन्त गुप्त रखा गया है । यह श्लोक सचमुच ही ग्रन्थ का हृदय है । जीवन्मुक्ति की प्राप्ति की रहस्यमयी विधि अतीव गोपनीय रखी गयी है । इस श्लोक को यदि अमनस्क योग रूप महान् धनभंडार को खोलने की कुंजी कहा जाय तो अनुचित न होगा । इसके रहस्य का पता लगाने में मुझे कमसे कम छः मास लग गये होंगे । जब मैं इसके विषय में कहीं से भी समाधान प्राप्त न कर सका तब एक दिन सहसा मुझे एक साधक का लिखा हुआ ग्रन्थ, “My Threeyears In Tibet” का स्मरण हो आया । उस साधक ने अपने ग्रन्थ में कुछ स्वानुभव भी दिये थे । उसमें एक स्थान पर वह लिखता है कि तिब्बत के दुर्गम मार्गों पर आगे बढ़ते समय कई बार ऐसा प्रसंग आया था कि मार्ग में तीन-चार विभिन्न दिशाओं के मार्ग आ मिलते थे । तब उनमें से सच्चे मार्ग का पता लगाने के लिये वह वहीं पर बैठ जाता था और हृदय- कमल में ज्योति का ध्यान किया करता था । अच्छी एकाग्रता का संपादन करने पर उसे हृदय में से ही सच्चा मार्गदर्शन मिल जाता था ।

[ १२ ] मैंने भी इसी प्रक्रिया का अवलम्बन किया। प्रयत्न करते-करते प्रायः एक मास हो गया। फिर भी निराश न हुआ। एक शुभ नीरव रात्रि के समय में जब मैं ध्यान कर रहा था तब मैंने एक विचित्र-सा दृश्य देखा जो महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा पर आधारित था। वह था "अर्जुन का मत्स्यवेध"। सहसा आंखे खुल गयीं। रहस्य का पता चल गया था इसलिये आनन्द होना स्वाभाविक था। उक्त प्रसंग से सम्बन्धित महाभारत के आदि पर्व के कुछ श्लोक इस प्रकार हैं— “अर्जुनो धनुषो ऽभ्याशे तस्थौ गिरिरिवाचलः। स तद्धनुः परिक्रम्य प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ ( महा० आदिपर्व १८७।१७ ) इस प्रकार जब ब्राह्मण लोग भांति-भांति की बातें कर रहे थे, उसी समय अर्जुन धनुष के पास जाकर पर्वत के समान अविचल भाव से खड़े हो गये। फिर उन्होंने धनुष के चारों ओर घूमकर उसकी परिक्रमा की। “प्रणम्य शिरसा देवमीशानं वरदं प्रभुम् । कृष्णं च मनसा कृत्वा जगृहे चार्जुनोधनुः ॥ १८ ॥ इसके बाद वरदायक भगवान् शंकर को मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और मन ही मन भगवान् श्री कृष्ण का चिन्तन करके अर्जुन ने वह धनुष उठा लिया। “यत् पार्थिवै रुक्मसुनीथ वक्त्रैः राधेय दुर्योधन शल्य शाल्वैः। तदा धनुर्वेद परैर्नृसिंहैः कृतं न सज्यं महतोऽपियत्नात् ॥ १६ ॥ तदर्जुनो वीर्यवतां तदर्प- स्तदैन्द्रिरिन्द्रावरजप्रभावः । सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण शराश्च जग्राह दशार्धसंख्यान् ॥ २० ॥

[ १३ ] अर्थ—रुक्म, सुनीथ, वक्र कर्ण, दुर्योधन, शल्म तथा शाल्व आदि धनुर्वेद के पारंगत विद्वान्, पुरुष सिंह राजा लोग महान् प्रयत्न करके भी जिस धनुष पर डोरी न चढ़ा सके, उसी धनुष पर विष्णु के समान प्रभावशाली एवं पराक्रमी, वीरों में श्रेष्ठतम अभिमान रखनेवाले इन्द्रकुमार अर्जुन ने पलक मारते-मारते प्रत्यंचा चढ़ा दी । इसके बाद उन्होंने वे पाँच बाण भी अपने हाथ में ले लिये । विव्याध लक्ष्यं निपपात तच्च छिद्रेण भूमौ सहसातिविद्धम् । ततोऽन्तरिक्षे च बभूव नादः समाजमध्ये च महान् निनादः ॥ २१ ॥ अर्थ—और उन्हें चला कर बात ही बात में लक्ष्य वेध दिया । वह विंधा हुआ लक्ष्य अत्यंत छिन्न-भिन्न हो यन्त्र के छेद से सहसा पृथिवी पर गिर पड़ा । उस समय आकाश में बड़े जोर का हर्षनाद हुआ और सभामण्डप में तो उससे भी महान आनन्द कोलाहल छा गया । “पुष्पाणि दिव्यानि ववर्ष देवः पार्थस्य मूर्ध्नि द्विषतां निहन्तुः ॥ २२ ॥ देवता लोग शत्रुहन्ता अर्जुन के मस्तक पर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे । उपर्युक्त वर्णन द्रौपदी स्वयंवर के समय अर्जुन द्वारा किये हुए मत्स्यवेध का है। अर्जुन अर्थात् साधक, द्रौपदी अर्थात् शांभवी । धरायन्त्र अर्थात् भेद ( लक्ष्य ) को प्रतिबिंबित करनेवाला भूमि पर एक विशेष प्रकार से बनाया हुआ यन्त्र ( जलकुण्ड ) जिसमें, मत्स्यवेध ( शांभवी मुद्रा ) करते समय, बहिर्दृष्टि स्थिर की जाती है । स्वयंवर में विजय प्राप्त होना अर्थात् साधक को शांभवी सिद्ध होना । मत्स्यवेध के समय अर्जुन ने धनुष पर शर चढ़ा कर उसे स्तंभ पर फिरती धातु निर्मित मत्स्य की ओर रखा है। ( अर्थात् धनुष को पकड़े हुए एक हाथ की मुट्ठी ऊपर की दिशा में है । ) यह हुआ “ऊर्ध्व मुष्टि” शब्द का अर्थ । अर्जुन ने अपनी दृष्टि पृथिवी पर बने हुए पानी के कुण्ड ( धरायन्त्र ) में पड़ने वाले धातुनिर्मित मत्स्य के प्रतिबिंब की ओर अर्थात् नीचे की ओर रखी है । यह हुआ “अधोदृष्टि” का अर्थ । भेद अर्थात्

[ १४ ]

लक्ष्य ( मत्स्य ) तो स्तंभ के ऊपर के ( ऊर्ध्व ) मार्ग में है जब कि अर्जुन का शिर नीचे की ओर, कुण्ड में दिखाई पड़ने वाले मत्स्य के प्रतिबिंब की ओर है। इस प्रकार "ऊर्ध्व लक्ष्य अधोदृष्टि" अर्थात् "बहिर्लक्ष्य बहिर्दृष्टि" की धरायन्त्र की विधि से ( शांभवी मुद्रा की क्रिया द्वारा ) साधक जीवन्मुक्त होगा।

द्वितीय खण्ड के श्लोक १० में शांभवी मुद्रा की विधि स्पष्ट रूप में बतायी गयी है। यहाँ पर कठिन त्राटक साधना के विषय में संकेत मात्र है और कहा है कि यह मुद्रा सर्व शास्त्रों में गोपित है। किन्तु श्लोक १५ में इस मुद्रा की रहस्यपूर्ण विधि आसानी से रखी गयी है और वह बोधगम्य हो जाय इसीलिए मत्स्यवेध के दृष्टांत रूप में, विचित्र शब्दजाल में ग्रथित कर दिया गया है और उसका फल जीवन्मुक्ति बताया है। १ यह श्लोक अमनस्क योग ग्रन्थ का हृदय है, यह बात निर्विवाद सत्य है। भगवत्कृपा से ध्यान की प्रक्रिया द्वारा इस श्लोक का जो रहस्य मुझे ज्ञात हुआ है उस सम्पूर्ण रहस्य को बिना कुछ

[ १५ ] इस ग्रन्थ के सम्पादन में मुझे बहुत से विद्वानों की अप्रकाश्य सहायता मिली है। मैं ऐसे सभी महानुभावों को धन्यवाद देना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ। इस ग्रन्थ की प्रस्तावना विश्व के लब्धप्रतिष्ठ और विख्यात विद्वान् महामहोपाध्याय डा० गोपीनाथ कविराज जी ने लिख कर अपना अनुग्रह मुझ पर पुनः व्यक्त करने की कृपा की है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक और नाथसन्त साहित्य के प्रतिष्ठित अध्येता डा० नागेन्द्र नाथ उपाध्याय ने योगिराज गोरक्षनाथ के जीवन, साधन और दर्शन पर एक विस्तृत लेख प्रकाशनार्थ देकर ग्रन्थ को अधिक उपयोगी बनाया है। उन्होंने ग्रन्थ के मुद्रण और प्रकाशन आदि की भी सारी व्यवस्था कर इसे इस रूप में प्रस्तुत किया है। ग्रन्थ के लिए आर्थिक व्यवस्था करने में श्री मंगतू राम जयपुरिया (कानपुर), श्री कमल ठक्कर (कलकत्ता), श्री दीपककुमार माथुर (देहरादून), श्री जमनादास नेगांधी, श्री राजेन्द्र कक्कड़ (वाराणसी) ने स्मरणीय योग प्रदान किया है। ये सभी लोग परम धन्यवाद के पात्र हैं। इस प्रकार इस ग्रन्थ को इस रूप में प्रस्तुत करने में मैंने कुछ नहीं किया। वस्तुतः सब कुछ का कर्ता-धर्ता तो मूलतः वह परम सत्ता नाथ ही है— कामतोऽकामतो वापि यत्करोमि शुभाशुभम्। तत्सर्वं त्वयिसन्न्यस्तं त्वत्प्रयुक्तः करोम्यहम्॥ नाहं कर्ता सर्वमेतद् नाथैव कुरुते यथा। —:०:—

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