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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ २० ] साधना के लिये उपयुक्त स्थान, योगासन, क्रियायोग, विभूतियों के लक्षण इत्यादि के विषय में प्रकाश देते हैं। "मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा" की उक्ति के अनुसार प्रसंगानुसार वे बहिर्मुखी वृत्तिवाले साधुओं की वेषभूषा, व्यवहार इत्यादि की निंदा भी कर देते हैं जिससे योगमार्ग पर प्रस्थान करने- वाला साधक सावधान रहे। उदरपूर्ति के लिये मारण-उच्चाटनादि मलिन मंत्रों में अभिरुचि को प्रपंच, विभिन्न प्रकार के आसन, बंध, मुद्रादि के अभ्यास में ही सारा समय व्यतीत करने की प्रवृत्ति को अज्ञान, और यहाँ तक कि देहस्थ नाड़ी विशेषांतर्गत षट्चक्रों में ध्यान की क्रिया को चित्त का विश्रम कहते हुए इन सबका परित्याग कर, जागतिक पदार्थों से दूर रहने का और अमनस्क सेवन का उपदेश देते हैं। तत्पश्चात् वे परमतत्त्व का निरूपण करते हैं और उसके बोध के विषय में साधना का रहस्य प्रशस्त करते हुए लयस्थयोगी, लय, लय के प्रकार, लययोग से प्राप्य सिद्धि इत्यादि के विषय में अद्भुत उपदेश देकर अन्त में चेतावनी देते हुए कहते हैं कि परब्रह्म में लीन होने के इच्छुक महापुरुष के लिये ये सिद्धियाँ सर्वनाशकारिणी होती हैं, इस- लिये उन्हें उनकी ओर आकृष्ट नहीं होना चाहिये। लयसाधना द्वारा योगी को परमानन्द की प्राप्ति होने पर अजरत्व एवं अमरत्व दोनों की एक ही साथ में महासिद्धि प्राप्त हो जाती है जिससे महाप्रलय होने पर भी उनका पात नहीं होता। द्वितीय खण्ड या उत्तरार्द्ध में मुनिश्रेष्ठ श्री वामदेव जी भगवान् देवाधि- देव शिवजी से विनीत भाव से प्रार्थना करते हैं कि प्रथम की भाँति ही परमानंद प्रदायक दूसरा उपदेश करने की कृपा करें। इसके प्रत्युत्तर में भगवान् उन्हें तारकयोग एवं अमनस्क योग में भेद, शांभवी मुद्रा का रहस्य, शांभव योग, अमनस्क विद्या और उसकी महिमा गाते हुए बाह्याडंबर की निंदा और अमनस्क के उपाय, प्राप्ति और अमनस्क योगी के लक्षणादि के विषय में अतीव बोधप्रद उपदेश प्रदान करते हैं। इस ग्रन्थ के विषय में मैं यहाँ पर एक महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करना अनुचित नहीं समझता। श्रीयुत कविराज जी से जब मैं इस ग्रन्थ के द्वितीय खंड के १५ वें श्लोक को समझ रहा था तब इसमें एक भारी उलझन पैदा हो गयी। श्लोक बड़ा ही विचित्र होने पर भी उसका शाब्दिक अनुवाद सरल था, किन्तु उसमें से