अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ११ ] कोई ठोस अर्थ नहीं निकलता था । यह देख श्रीयुत कविराज जी भी हैरान रह गये । कुछ समय तक इसके अर्थ के बारे में विचार करने पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह श्लोक ही इस ग्रन्थ का हृदय है अर्थात् अत्यन्त रह- स्यपूर्ण है । इसलिये योग की प्रक्रिया विचित्र शब्दजाल में गुप्त रखी गयी है । मैंने मन ही मन कहा कि इस श्लोक का रहस्य खुलने पर ही इस ग्रन्थ को प्रकाशित करना उचित है, अन्यथा कदापि नहीं । अब इसको बोधगम्य करने के लिये मैंने कई विद्वान्, साधक, साधु-महात्माओं के द्वार खटखटाये, किन्तु निराशा ही हाथ लगी । इसे देख सबकी बुद्धि चकरा जाती थी । यह श्लोक इस प्रकार है— “ऊर्ध्वमुष्टिरधोदृष्टिरूर्ध्वभेदस्तधः शिराः । धरायन्त्रविधानेन जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥ १५ ॥ इसका शाब्दिक अर्थ है—“ऊपर की ओर मुष्टि, नीचे की ओर दृष्टि, ऊपर को भेद और नीचे की ओर सिर कर “धरायन्त्र” की विधि से साधक जीवन्मुक्त होगा ।” इस प्रकार के सरल अर्थ से कुछ भी समझ में नहीं आता । मुष्टि क्या है ? भेद एवं शिर किसे कहते हैं ? धरायन्त्र कौन-सी वस्तु है ? इन सबको यहाँ पर अत्यन्त गुप्त रखा गया है । यह श्लोक सचमुच ही ग्रन्थ का हृदय है । जीवन्मुक्ति की प्राप्ति की रहस्यमयी विधि अतीव गोपनीय रखी गयी है । इस श्लोक को यदि अमनस्क योग रूप महान् धनभंडार को खोलने की कुंजी कहा जाय तो अनुचित न होगा । इसके रहस्य का पता लगाने में मुझे कमसे कम छः मास लग गये होंगे । जब मैं इसके विषय में कहीं से भी समाधान प्राप्त न कर सका तब एक दिन सहसा मुझे एक साधक का लिखा हुआ ग्रन्थ, “My Threeyears In Tibet” का स्मरण हो आया । उस साधक ने अपने ग्रन्थ में कुछ स्वानुभव भी दिये थे । उसमें एक स्थान पर वह लिखता है कि तिब्बत के दुर्गम मार्गों पर आगे बढ़ते समय कई बार ऐसा प्रसंग आया था कि मार्ग में तीन-चार विभिन्न दिशाओं के मार्ग आ मिलते थे । तब उनमें से सच्चे मार्ग का पता लगाने के लिये वह वहीं पर बैठ जाता था और हृदय- कमल में ज्योति का ध्यान किया करता था । अच्छी एकाग्रता का संपादन करने पर उसे हृदय में से ही सच्चा मार्गदर्शन मिल जाता था ।