अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १२ ] मैंने भी इसी प्रक्रिया का अवलम्बन किया। प्रयत्न करते-करते प्रायः एक मास हो गया। फिर भी निराश न हुआ। एक शुभ नीरव रात्रि के समय में जब मैं ध्यान कर रहा था तब मैंने एक विचित्र-सा दृश्य देखा जो महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा पर आधारित था। वह था "अर्जुन का मत्स्यवेध"। सहसा आंखे खुल गयीं। रहस्य का पता चल गया था इसलिये आनन्द होना स्वाभाविक था। उक्त प्रसंग से सम्बन्धित महाभारत के आदि पर्व के कुछ श्लोक इस प्रकार हैं— “अर्जुनो धनुषो ऽभ्याशे तस्थौ गिरिरिवाचलः। स तद्धनुः परिक्रम्य प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ ( महा० आदिपर्व १८७।१७ ) इस प्रकार जब ब्राह्मण लोग भांति-भांति की बातें कर रहे थे, उसी समय अर्जुन धनुष के पास जाकर पर्वत के समान अविचल भाव से खड़े हो गये। फिर उन्होंने धनुष के चारों ओर घूमकर उसकी परिक्रमा की। “प्रणम्य शिरसा देवमीशानं वरदं प्रभुम् । कृष्णं च मनसा कृत्वा जगृहे चार्जुनोधनुः ॥ १८ ॥ इसके बाद वरदायक भगवान् शंकर को मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और मन ही मन भगवान् श्री कृष्ण का चिन्तन करके अर्जुन ने वह धनुष उठा लिया। “यत् पार्थिवै रुक्मसुनीथ वक्त्रैः राधेय दुर्योधन शल्य शाल्वैः। तदा धनुर्वेद परैर्नृसिंहैः कृतं न सज्यं महतोऽपियत्नात् ॥ १६ ॥ तदर्जुनो वीर्यवतां तदर्प- स्तदैन्द्रिरिन्द्रावरजप्रभावः । सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण शराश्च जग्राह दशार्धसंख्यान् ॥ २० ॥