अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १३ ] अर्थ—रुक्म, सुनीथ, वक्र कर्ण, दुर्योधन, शल्म तथा शाल्व आदि धनुर्वेद के पारंगत विद्वान्, पुरुष सिंह राजा लोग महान् प्रयत्न करके भी जिस धनुष पर डोरी न चढ़ा सके, उसी धनुष पर विष्णु के समान प्रभावशाली एवं पराक्रमी, वीरों में श्रेष्ठतम अभिमान रखनेवाले इन्द्रकुमार अर्जुन ने पलक मारते-मारते प्रत्यंचा चढ़ा दी । इसके बाद उन्होंने वे पाँच बाण भी अपने हाथ में ले लिये । विव्याध लक्ष्यं निपपात तच्च छिद्रेण भूमौ सहसातिविद्धम् । ततोऽन्तरिक्षे च बभूव नादः समाजमध्ये च महान् निनादः ॥ २१ ॥ अर्थ—और उन्हें चला कर बात ही बात में लक्ष्य वेध दिया । वह विंधा हुआ लक्ष्य अत्यंत छिन्न-भिन्न हो यन्त्र के छेद से सहसा पृथिवी पर गिर पड़ा । उस समय आकाश में बड़े जोर का हर्षनाद हुआ और सभामण्डप में तो उससे भी महान आनन्द कोलाहल छा गया । “पुष्पाणि दिव्यानि ववर्ष देवः पार्थस्य मूर्ध्नि द्विषतां निहन्तुः ॥ २२ ॥ देवता लोग शत्रुहन्ता अर्जुन के मस्तक पर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे । उपर्युक्त वर्णन द्रौपदी स्वयंवर के समय अर्जुन द्वारा किये हुए मत्स्यवेध का है। अर्जुन अर्थात् साधक, द्रौपदी अर्थात् शांभवी । धरायन्त्र अर्थात् भेद ( लक्ष्य ) को प्रतिबिंबित करनेवाला भूमि पर एक विशेष प्रकार से बनाया हुआ यन्त्र ( जलकुण्ड ) जिसमें, मत्स्यवेध ( शांभवी मुद्रा ) करते समय, बहिर्दृष्टि स्थिर की जाती है । स्वयंवर में विजय प्राप्त होना अर्थात् साधक को शांभवी सिद्ध होना । मत्स्यवेध के समय अर्जुन ने धनुष पर शर चढ़ा कर उसे स्तंभ पर फिरती धातु निर्मित मत्स्य की ओर रखा है। ( अर्थात् धनुष को पकड़े हुए एक हाथ की मुट्ठी ऊपर की दिशा में है । ) यह हुआ “ऊर्ध्व मुष्टि” शब्द का अर्थ । अर्जुन ने अपनी दृष्टि पृथिवी पर बने हुए पानी के कुण्ड ( धरायन्त्र ) में पड़ने वाले धातुनिर्मित मत्स्य के प्रतिबिंब की ओर अर्थात् नीचे की ओर रखी है । यह हुआ “अधोदृष्टि” का अर्थ । भेद अर्थात्