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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ६ ] श्री गोपीनाथ कविराज, पद्मविभूषण, से सुना तब से ही उसे प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा हुई। तदनुसार राजस्थान, सौराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, नैपाल इत्यादि के नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध स्थानों में उसके विषय में पूछ-ताछ की, किन्तु सभी स्थानों से निराशा ही हासिल हुई। कुछ लोग तो अमनस्क नामक कोई ग्रन्थ है यह बात मानने को भी तैयार नहीं थे। आखिर प्रायः छः वर्षों के कठिन परिश्रम के उपरान्त मुझे मैसूर प्रान्त से कन्नड़ भाषा में इस ग्रन्थ की अपूर्ण एवं कई स्थानों में त्रुटिपूर्ण एक प्रति प्राप्त हुई। एक कन्नड़भाषी सज्जन से कन्नड़ लिपि के श्लोकों को संस्कृत में आबद्ध करवाया और जहाँ कहीं अपूर्णता एवं अशुद्धियां थीं उन्हें श्रीयुत डा० गोपीनाथ कविराज जी की सहायता से दूर किया। इस प्रकार कन्नड़ भाषा की प्रति में से ६८ श्लोक प्राप्त हुए किन्तु इस प्रति के आधार पर अमनस्क के विषय में जो कुछ ज्ञान था वह अपर्याप्त ही था। अब मैंने इस ग्रन्थ के शेष भाग की खोज शुरू कर दी। भारत के कितने ही प्राचीन हस्तलेख संग्रहस्थानों से पत्र-व्यवहार किया। कुछ अगम्य स्थानों में गया भी। इस प्रकार शोध करते-करते आखिर मैं शेष ११३ श्लोकों को प्राप्त कर सका। सब मिलाकर इन २११ श्लोकों को शुद्ध कर, दो खण्डों में व्यवस्थित रूप में रख कर, उनका सरल अनुवाद किया। जहाँ कहीं टिप्पणियों की आवश्यकता प्रतीत हुई वहीं संक्षेप में लिख कर ग्रन्थ रूप में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह सब श्रीयुत गोपीनाथ कविराज जी के मार्गदर्शन से ही सम्पन्न हो सका है जिसके लिए मैं उनका चिरकृतज्ञ हूं। अमनस्क ग्रन्थ के जो दो हस्तलेख मुझे अच्छी हालत में प्राप्त हुए हैं उनमें से ही यहाँ पर पाठभेद दिया जा रहा है। बाद में और जो कुछ जीर्ण अवस्था वाली पोथियाँ मुझे देखने को मिली उनमें उस ग्रन्थ के विभिन्न नाम पाये गये हैं, जैसे—अमनस्क, अमनस्कयोग, अमनस्क योग-शास्त्रम्, अमनस्कखंड, श्री ईश्वर-वामदेव संवाद, स्वयंबोध इत्यादि। अमनस्क ग्रन्थ ईश्वर एवं वामदेव के संवाद रूप में है। मुनिश्रेष्ठ श्री वामदेव जी कैलासपर्वत के शिखर पर पहुँचते है और वहीं पर स्वस्वभाव में स्थित भगवान् श्री कैलासपति शिवजी को श्रद्धाभक्तिपूर्वक प्रणाम कर सरस हृदय एवं जिज्ञासु वृत्ति से जीवन्मुक्ति के उपाय के विषय में प्रश्न करते हैं। मुनिवर की उत्कट ज्ञान-पिपासा एवं अहैतुकी भक्ति देखकर योग-योगीश्वर भगवान् शिव जी उनको तारक योग का रहस्य, योगी गुरु के लक्षण, योग