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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ३० ] करता है। उसकी इस प्रकार की क्रिया से साधक सम्यक् आनन्द में मग्न हो जाता है। उसकी यह कृपा विश्रांतिकारक होती है। बिना स्वात्मगत विश्रांति के पिंडपद का परमपद में समरसीकरण नहीं हो सकता। शास्त्र, अनुमान, तर्क आदि से भ्रांत करनेवाला गुरु गुरु नहीं। उपर्युक्त गुण-धर्मों से समलंकृत गुरु को प्राप्त कर शिष्य जन्म और संसार-बंधन से मुक्त हो जाता तथा परानन्दमय होकर निष्कल शिवत्व की उपलब्धि करता है।५९ प्रकृति के सभी विकारों का अवधूनन करनेवाला सिद्ध ही, अवधूत योगी ही सद्गुरु का पद प्राप्त कर सकता है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति में सिद्ध योगी अवधूत को अत्याश्रमी, योगी, सिद्धयोगी, जितेन्द्रिय आदि कहा गया है।६० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह में षोडशनित्यातन्त्र का उद्धरण देकर गुरु रूप में शिव को नमस्कार किया गया है। गुरु की ही कृपा से स्वल्प कल्प मात्र से सहज सिद्धि प्राप्त होती है। इस गुरु को ३६ लक्षणों से सम्पन्न होना चाहिए। अधिक तत्वों से गुरु कहा जाता है। गुरु से शिष्य के ४ लक्षण कम होते हैं अर्थात् उसमें ३२ लक्षण आवश्यक माने गये हैं। इनसे कम लक्षणों से युक्त सिद्ध व्यक्ति को गुरु रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए। ३२ से कम लक्षणों से युक्त व्यक्ति को शिष्य भी नहीं बनाना चाहिए। इन ३२ लक्षणों के लिए आठ परीक्षाएं स्वीकार की गयी हैं। गोरक्ष- सिद्धान्तसंग्रह में वर्णित ये लक्षण अवधूत-सम्प्रदाय के अनुसार बताये गये हैं।६१ संक्षेप में हम इसे 'गोरक्षनाथ का गुरु-शिष्यवाद और अधिकार-भेदवाद' कह सकते हैं। नाथ मार्ग का परमपद 'नाथ' है। गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहकार ने 'नाथस्वरूपेणावस्थानम्' को ही लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया है। नाथ के सम्बन्ध में पहले ही कहा गया है कि प्रसार और संकोच का जो आदि अन्त है, वही साम्यावस्था है, वही निराभास है, वही शिवावस्था है। यह समरसावस्था ही अद्वयावस्था है और यही समाधि ५९. सि० सि० ग्र० व० ना० यो० में सिद्धसिद्धान्तपद्धति, ५.५४-८१ । ६०. वही, सिद्धसिद्धान्तपद्धति : सम्पूर्ण षष्ठ उपदेश । ६१. गो० सि० सं०, पृ० ३१-३२, ४५, ४६, १४, ४०, ५६-५७ । नाथ और सन्त साहित्य : पृ० २६८-७० ।