अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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सामरस्य है । ' ' ' सामरस्य और निरुत्थान दशा, दोनों के अंतराल में कुछ अवस्थाओं का पता चलता है । पूर्ण स्वातन्त्र्य से समन्वित आत्मा का स्फुरण निरुत्थान दशा के नाम से प्रसिद्ध है । ' ' ' नाथयो- गियों का लक्ष्य यह है कि पहले पिंडसिद्धि के द्वारा जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो । इस समय में कालवंचन सिद्ध होता है । अर्थात् काल के प्रभाव से योगी मुक्त हो जाता है । इसके अनन्तर समरसीकरण के द्वारा परा मुक्ति की सिद्धि होती है । प्रकारान्तर से कहा जा सकता है कि पिंडसिद्धि या जीवन्मुक्ति के अनन्तर ओंकार साधना के द्वारा परामुक्ति का आविर्भाव होता है ।५७ ऊपर बतायेगये नाथों के लक्ष्य से यह बात स्पष्ट हो गयी कि नाथों के दो लक्ष्य हैं—प्रथम गौण और द्वितीय मुख्य । गौण लक्ष्य है पिण्डसिद्धियुक्त जीवन्मुक्ति और मुख्य लक्ष्य है पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण । यदि पहले की दार्शनिक तत्त्वज्ञानात्मक विचारणा को ध्यान में रखा जाय तो यह दूसरा लक्ष्य पूर्णतया स्पष्ट हो जायगा । इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नाथसंप्रदाय में विशेषकर गोरक्षनाथ के ग्रंथों में साधनाक्रम का पूर्ण प्रकाशित रूप मिलता है । गोरक्ष के साधनमार्ग में 'गुरु' को बहुत महत्व दिया गया है । परमपद में समरसीकरण, जो नाथों का चरम लक्ष्य है, गुरु की कृपा से ही होता है । गुरुचरणों में रत रहने से स्वसंवेद्य परमपद की सिद्धि सम्भव बतलायी गयी है । केवल इसी साधन से योगियों को पिण्ड के निरुत्थान का अनुभव होता है तथा उसके पश्चात् समरसीकरण की सिद्धि होती है ।५८ सिद्धसिद्धान्तपद्धति में कहा गया है कि सिद्धपुरुष अदैहिक साधनों का आश्रयण कर परमपद को प्राप्त करते हैं और इन साधनों में स्थिति गुरु के दृक्पात से होती है । इसलिए गुरु से बड़ा कोई नहीं है । वह अपनी करुणा के खड्गपात से पशु (साधक) के आठों प्रकार के पाशों का छेदन
५७. वही—प्राक्कथन—म० म० डा० गोपीनाथ कविराज, पृ० ५-६ । ५८. नाथ और सन्त-साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन—डा० ना० उपाध्याय, पृ० २६७; सि० सि० प० अ० ना० यो० : सम्पादक—डा० कल्याणी मल्लिक, सिद्धसिद्धान्तपद्धति, ५.१-१२ । ५