भारतकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

[ ६ ] सुखासने समासीनस्तत्त्वाभ्यासं समाचरेत् । सदाभ्यासेन तत्कुर्यात् परतत्त्वप्रकाशनम्१ ॥ ३० ॥ सुखासन पर बैठकर परतत्त्व का अभ्यास करना चाहिये । साधक को चाहिये कि सदा के अभ्यास द्वारा उस परतत्त्व को प्रकाश में लावे ॥ ३० ॥ ब्रह्माण्डं पंचभूतस्थं पंचभूतमयी तनुः । सर्वं भूतमयं चेति२ त्यक्त्वा नास्तीति चिन्तय३ ॥३१॥ सारा ब्रह्माण्ड पंचभूतों पर आधृत है, शरीर भी पंचभूतमय है, यही क्यों सब कुछ भूतमय है, इसलिए उन सबका परित्याग कर “ये है ही नहीं” ऐसी भावना करो ॥ ३१ ॥ न किंचिन्मनसा ध्यायेत्सर्वचिन्ता विवर्जितः । सबाह्याभ्यन्तरे योगी जायते तत्त्वसंमुखः ॥ ३२ ॥४ सब तरह की चिन्ताओं से रहित होकर मन से किसी का भी चिन्तन न करे ऐसे योगी के बाहर और भीतर तत्त्व सम्मुख हो जाता है अर्थात् उसे बाहर और भीतर तत्त्व का स्फुरण हो जाता है ॥ ३२ ॥ तत्त्वस्य संमुखे जाते अमनस्क५ प्रजायते । असनस्केऽपि संजाते चित्तादि६विलयो भवते ॥ ३३ ॥ तत्त्व के संमुख होने पर७ अमनस्क योग हो जाता है । अमनस्क योग की प्राप्ति होने पर चित्त आदि का भली भांति लय हो जाता है ॥ ३३ ॥ १. (ख) परं तत्त्वं प्रकाशते । २. (ख) वेति । ३. (ख) भावयेत् । ४. हठयोगप्रदीपिका में भी लिखा है कि :- बाह्यचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तनम् । सर्वचिन्ता परित्यज्य न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ ५. (ख) त्वमनस्कं । ६. (ख) चिन्तादिविलयो । ७. आत्मा के संमुख होने पर ।