अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १० ] चित्तादिविलये जाते पवनस्य लयो भवेत्¹ । मनःपवनयोर्नाशादिन्द्रियार्थं विमुञ्चति ॥ ३४ ॥ चित्त आदि का विलय हो जाने पर पवन ( वायु ) का लय हो जाता है । मन और पवन दोनों का विनाश ( विलय ) होने पर साधक इन्द्रियार्थों ( रूप, शब्द, गन्ध, रस और स्पर्श ) का त्याग कर देता है । 'इन्द्रियार्थाद् विमुच्यते' ऐसा पाठ मानने पर इन्द्रियार्थों से मुक्त हो जाता है, यह अर्थ करना चाहिये ॥ ३४ ॥ इन्द्रियार्थैर्यदा मुक्तो² बाह्यज्ञानं न जायते । बाह्यज्ञाने विनष्टे च ततः सर्वसमो भवेत् ॥ ३५ ॥ जब साधक इन्द्रियार्थों से ( रूप, शब्द, गन्ध आदि से ) मुक्त हो जाता है तब उसे बाहरी ज्ञान नहीं होता है । बाहरी ज्ञान के विनष्ट होने पर वह “सर्वसम” यानी विषमता रहित हो जाता है ॥ ३५ ॥ यदा सर्वसमे जाते³ भवेद् व्यापारवर्जितः । परब्रह्मणि⁴ सम्पन्नो⁵ योगी प्राप्तलयस्तदा ॥ ३६ ॥ जब साधक सर्वसम होने पर व्यापाररहित होता है तब परब्रह्म में सम्पन्न योगी लय को प्राप्त कहा जाता है । ३६ ॥ सदाभ्यासरतानां च यः परो जायते लयः । तस्याहं संप्रवक्ष्यामि लक्षणं मुक्तचेतसः ॥ ३७ ॥ सदा परतत्त्व के अभ्यास में निरत योगियों का जो उत्कृष्ट लय होता है उसका, जिसमें चित्त मुक्त हो जाता है, लक्षण मैं आगे कहूँगा ॥ ३७ ॥ १. ( ख ) यह पूरी पंक्ति नहीं है । २. (ख) इन्द्रियार्थे विनिर्मुक्ते । ३. (ख) यदासर्वसमो जातो । ४. (ख) परे ब्रह्मणि । ५. (ख) संबुद्धः ।