अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १२ ] लवणं तोयसंस्पर्शाद् यथा१ तोयमयं भवेत् । मनोऽपि ब्रह्म संस्पर्शात्तथा ब्रह्ममयं भवेत् ॥ ४३ ॥ जैसे नमक जल के सम्पर्क से जलमय हो जाता है वैसे ही ब्रह्म के संस्पर्श से मन भी ब्रह्ममय हो जाता है ॥ ४३ ॥ यथाक्षारमयत्वेन प्राप्नोति२ लवणं स्वकम् । ब्रह्मज्ञानमयत्वेन निर्वाणं मनसस्तथा ॥ ४४ ॥ जैसे जल में लवण की सत्ता जल के क्षारमय होने से प्राप्त होती है वैसे ही मन का ब्रह्म में निर्वाण मन के ब्रह्मज्ञानमय होने से प्रतीत होता है ॥४४॥ घृतात् पृथ'क्तारहितं घृते लीनं घृतं यथा । तत्त्वे लीनस्तथा योगी पृथग्भावं न विन्दति ॥ ४५ ॥ जैसे घृत में डुबा हुआ घृत घृत से पृथकता ( भेद ) रहित अर्थात् भिन्न नहीं है वैसे ही तत्त्व ( सत्ता ) में लीन हुआ योगी पृथग्भाव अर्थात् तत्त्व से अपना भेद नहीं जानता है ॥ ४५ ॥ निमेषेण श्वासपलै३ र्नाडी