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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 128 में से

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[ १३ ] योगी निमेषमात्रेण लयेन लभते ध्रुवम् । स्पर्शनं परतत्त्वस्याप्युत्थानं च पुनः पुनः ॥ ४८ ॥ योगी एक निमेषमात्र के लय से निश्चय ही परतत्त्व के स्पर्श को प्राप्त होता है और उससे पुनः पुनः व्युत्थान को प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥ घर्मशान्तिः प्रजायेत मुहुर्निद्रा च मूर्च्छना । निमेषषट्कमात्रेण लयेनान्तःस्थ योगिनः१ ॥ ४६ ॥ छह निमेषों तक के लय से अन्तर्वृत्तिवाले योगी की तापशान्ति होती है, बार बार निद्रा और मूर्च्छा आती है ॥ ४६ ॥ श्वासमात्रलयेनापि तेन प्राणादिवायवः । श्वासप्रवाहसम्बन्धात् स्वे स्वे स्थाने वहन्ति ते ॥ ५० ॥ एक श्वास तक रहनेवाले लय से भी प्राण आदि वायु श्वास प्रवाह के साथ सम्बन्ध होने से अपने अपने स्थान में बहते हैं ॥ ५० ॥ श्वासद्वयलयेनापि कूर्मनागादिवायवः२ । निवर्तन्ते च धातूनां बन्धं कुर्वन्ति धातुगाः३ ॥ ५१ ॥ दो श्वास तक रहने वाले लय से भी कूर्म, नाग आदि वायु निवृत्त हो जाते हैं और धातुगत होकर धातुओं को पुष्ट करते हैं ॥ ५१ ॥ चतुःश्वासलयेनापि सप्तधातुगताः रसाः । रसपुष्टिं४ प्रकुर्वन्ति धातूनां समवायवः ॥ ५२ ॥ चार श्वास तक के लय से भी सातों धातुओं (कफ, पित्त, रस, रक्त, वसा, मज्जा, शुक्र) के रस समवायु होकर धातुओं के रसों की पुष्टि करते हैं ॥ ५२ ॥

१. (ख) लयेनिष्ठा च योगिनः । २. (ख) कूर्मवातादिवायवः । ३. (ख) धातवः । ४. (ख) समं पुष्टिं ।

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