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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ १४ ] लयेन पलमात्रेण१ चासनस्थो न खिद्यते२ । स्वल्पश्वासो भवेद् योगी स्वल्पोन्मेषयुतस्तदा३ ॥ ५३ ॥ एक पल तक के लय से भी आसन पर चाहे कितनी ही देर तक क्यों न बैठे, योगी को थकान मालूम नहीं होती है । तब उसके श्वास-प्रश्वास कम हो जाते हैं और निमेष-उन्मेष भी बहुत कम होते हैं ॥ ५३ ॥ पलद्वयलयेनापि हृन्नाड्याश्चालनं४ भवेत् । अनाहतः स विज्ञेयो मनस्तत्रैव विन्यसेत्५ ॥ ५४ ॥ दो पल तक के लय से भी हृदय-नाड़ी का चालन ( जागना ) होता है६, उसे अनाहत जानना चाहिये । योगी मन को उसी में लगावे ॥ ५४ ॥ चतुःपलप्रमाणेन लयेनानुभवो भवेत् । अकस्मान्निपतत्येव शब्दः कर्णो शुभावहः७ ॥ ५५ ॥ चार पल तक के लय से अनुभव होता है । अकस्मात् कान में सुन्दर सुमधुर शब्द सुनाई पड़ता है ॥ ५५ ॥ पलाष्टकलयेनापि कामस्तस्य निवर्तते । कदापि८ नैव जायेत कामिन्यालिंगितस्य च ॥ ५६ ॥ आठ पल तक के लय से उसकी कामवासना निवृत्त हो जाती है । कामिनी द्वारा आलिंगित होने पर उसे कभी भी कामोत्पत्ति नहीं होती है ॥ ५६ ॥ १. (ग) लयेन लयमात्रेण । २. (ख) विद्यते । ३. (ख) स्वल्पो मेखलयस्तथा । ४. (ख) हृन्नाड्याश्चलनं । ५. (ख) तत्रैवमभ्यसेन्मनः । ६. "हृदय-नाडी का चालन" का अर्थ है अनाहत का क्रियाशील होना । ७. (ख) शब्दस्पातं शुभाशुभम् । ८. (क) तथापि ।