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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ १५ ] कलापादलयेनापि सुषुम्णां यान्ति वायवः¹ । सुषुम्णावदने गत्या आशु शुद्ध्यन्ति वायवः² ॥ ५७ ॥ चौथाई कला ( घड़ी ) तक के लय से भी प्राणादि वायु सुषुम्णा में चले जाते हैं । सुषुम्णा के मुख में गमन से तत्काल सब वायु शुद्ध हो जाते हैं ॥५७॥ घटिकार्द्धलयेनापि शक्तिः कुण्डलिनी परा³ । मनोवातनिरोधेन जागर्त्याधारसंस्थिता⁴ ॥ ५८ ॥ आधी घड़ी तक के लय से निश्चय ही मूलाधार में स्थित परा कुण्डलिनी शक्ति मन और वायु के निरोध से जाग जाती है ॥५८ ॥ कलामात्रलयेनापि⁵ शक्तिः संचलते ध्रुवम् । ⁶ऊर्द्ध्वपश्चिममार्गेण वातरोधेन जाग्रती⁷ ॥ ५६ ॥ एक घड़ी तक के लय से भी वायु का रोध होने पर जगी हुई कुण्डलिनी शक्ति पश्चिम मार्ग ( सुषुम्णा मार्ग ) द्वारा ऊर्ध्वमुखी होकर चलने लगती है ॥ ५६ ॥ कलाद्वयलयेनापि शक्तेः संचलनेन वा⁸ । क्षणादुत्पद्यते तस्य मनसः कम्पनं सकृत् ॥ ६० ॥ दो घड़ी तक के लय से तथा शक्ति के संचलन से एक क्षण में एक बार योगी के मन कम्पन उत्पन्न होता है ॥ ६० ॥ १. (ख) सुषुम्णामार्गवाहिनी । २. (ख) तदा पश्चिममार्गेण तस्य भोगेन गच्छति । (क) मील्या (शुचिवद्यान्ति ) वायवः । ३. (क) शक्तिः संचलते ध्रुवम् । (ख) शक्ति कुण्डलिनी परा । ४. (क) ऊर्ध्वपश्चिममार्गेण वातरोधेन जाग्रति ( जाग्रती ? ) । ५. (क) घटिकैकलयेनापि सुषुम्णा मार्गवाहिनी । ६. कला । ७. गच्छति । ८. (क) शक्तिसंचालनेन वा । (ख) शक्ते संचलनेन च ।