अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १६ ] चतुः कलालयेनापि निद्राभावो निवर्तते । हृदि स्फुलिंगवद् योगी तेजोबिन्दुं प्रपश्यति ॥ ६१ ॥ चार घड़ी तक के लय से योगी का निद्राभाव निवृत्त हो जाता है और वह हृदय में चिनगारी के सदृश तेजो बिन्दु का दर्शन करता है ॥ ६१ ॥ दिनपादलयेनापि स्वल्पाहारो भवेन्नरः१ । स्वल्पमूत्रपुरीषश्च लघुता स्निग्धता तनोः२ ॥ ६२ ॥ चौथाई दिन तक के लय से भी योगी पुरुष का आहार बहुत घट जाता है, उसका मूत्र और पुरीष ( मल ) भी बहुत अल्प मात्रा में होता है एवं शरीर में हल्कापन और स्निग्धता आ जाती है ॥ ६२ ॥ वासरार्धलयेनापि स्वात्मज्योतिः प्रकाशते । सूर्यो गोभिरिवोद्दीप्तो३ योगी विश्वं प्रकाशते ॥ ६३ ॥ आधे दिन तक के लय से आत्मज्योति प्रकट होती है। सूर्य जैसे किरणों से उद्दीप्त रहता है वैसे ही योगी उद्दीप्त होकर विश्व को प्रकाशित करता है ॥ ६३ ॥ दिनमात्रलयेनापि स्वात्मतत्त्वं प्रकाशते । इन्द्रियज्ञानविस्तारो ब्रह्माण्डेऽप्यनुवर्तते४ ॥ ६४ ॥ दिन भर तक रहने वाले लय से आत्मतत्त्व प्रकाशित होता है और इन्द्रियों के ज्ञान का विस्तार सारे ब्रह्माण्ड तक हो जाता है ॥ ६४ ॥ १. (ख) भवेत्ततः । २. (ख) स्वल्पमूत्रपुरीषत्वं लघुता स्निग्धता तथा । ३. (ख) स सुगोभिरिवोद्धीप्तो । ४. (ख) ब्रह्माण्डेप्यस्य जायते ।