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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

[ १८ ] एकत्वं चेन्द्रियज्ञानं महत्त्वानुभवात्मकम्¹। जानात्यनेन योगीन्द्रः सकलं विश्ववर्तनम् ॥ ७० ॥ इससे योगिराज स्वानुभवात्मक एकत्व, विस्तृत ब्रह्माण्डव्यापी इन्द्रियज्ञान तथा सकल विश्व में स्थिति जान जाता है ॥ ७० ॥ रात्रिषट्कलयेनापि² महाबुद्धिः प्ररोहति । तावत्कार्यमतीतं³ च विश्वज्ञानं प्रवर्तते ॥ ७१ ॥ छह अहोरात्रव्यापी लय से महाबुद्धि उत्पन्न होती है जिससे सब कार्यों तथा अतीत और अनागत विश्व का ज्ञान होता है ॥ ७१ ॥ सप्तरात्रलयेनापि परे लीनस्य योगिनः । आब्रह्मविश्ववेत्तृत्वं श्रुतिज्ञानं च वर्तते⁴ ॥ ७२ ॥ सात अहोरात्रव्यापी लय से भी परतत्त्व में लीन हुए योगी का ब्रह्म- पर्यन्त विश्वज्ञान तथा श्रुतिज्ञान हो जाता है ॥ ७२ ॥ अष्टरात्रलयेनापि भवेद् योगी निरामयः । क्षुत्पिपासादिभावैश्च सहजस्थो न पीड्यते⁵ ॥ ७३ ॥ आठ अहोरात्रव्यापी लय से सहजस्थ ( परतत्त्व में लीन ) योगी, निरोग हो जाता है एवं क्षुधा, प्यास आदि से भी पीड़ित नहीं होता है ॥ ७३ ॥ नवरात्रलयेनापि निर्वेदस्यात्मवर्त्मनः⁶। वाचः सिद्धिर्भवेत्येव⁷ शापानुग्रहकारिणी ॥ ७४ ॥ नौ अहोरात्रव्यापी लय से अपरोक्ष आत्मज्ञान के मार्गरूप निर्वेद ( वैराग्य ) की सिद्धि तथा शाप और अनुग्रहकारिणी वाक्सिद्धि अवश्य ही होती है ॥ ७४ ॥ १. (ख) एवं पंचेन्द्रियज्ञानं महत्तत्त्वस्य कारणम् । २. (ख) षड्रात्रिविलयेनापि । ३. (क) यावत्कर्ममतीतं च । (ख) यावत्तर्कमतीतं च । ४. (ख) आब्रह्मविश्वेश्वरत्वं श्रुतिज्ञानं च जायते । ५. (ख) सहजैरपि न पीड्यते । ६. (ख) निर्भेदः स्वात्मवर्तिनः । ७. (ख) वाचःसिद्धि भवेत्तस्य ।