अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
पृष्ठ 89, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १६ ] दशरात्रलयेनपि योगीन्द्रः स्वात्मनि स्थितः । यानि कानि च गुप्तानि१ महाचित्राणि पश्यति ॥ ७५ ॥ दस अहोरात्रव्यापी लय से स्वात्मनिष्ठ योगीन्द्र भाँति-भाँति के गुप्त महाश्चर्यों को देखता है ॥ ७५ ॥ २ततश्चैकादशाहेन३ लयस्थस्य जवोदयात् । मनसा सहितस्यापि गन्तुमिच्छति विग्रहः ॥ ७६ ॥ ग्यारह अहोरात्र तक लय में स्थित योगीन्द्र की मन के साथ-साथ काया की गति होती है ॥ ७६ ॥ द्वादशाहलयेनापि भूचरत्वं हि सिद्धयति । निमेषार्धप्रमाणेन४ पर्यटत्येव भूतले५ (लम् ?) ॥ ७७ ॥ बारह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को भूचरत्व की सिद्धि होती है जिसके कारण केवल आधे निमेष ( पलक मारने ) में सारे भूतल में चारो ओर घूम लेता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७७ ॥ ततस्त्रयोदशाहेन लयेनापि महाद्भुताम्६ । योगीन्द्रः खेचरीसिद्धिं लभते चिन्तनादपि७ ॥ ७८ ॥ तदनन्तर तेरह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को केवल चिन्तनमात्र ( ख्याल करने ) से अद्भुत खेचरी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ७८ ॥ १. (ख) सुगुप्तानि । २. (क) तथा । ३. (क) तस्य चैकादशाहेन लयस्थस्य जयोदयात् । ४. (क) निमिषार्धप्रमाणेन । ५. (ख) भूतलम् । ६. (क) और (ख) महाद्भुतम् । ७. (ख) चेतनादपि ।