अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २० ] चतुर्दशदिनान्तं तु¹ लयस्थो यदि तिष्ठति । अणिमाख्या च सिद्धिः² स्यादणुत्वं प्राप्यते यया ॥७६॥ यदि योगी चौदह दिन पर्यन्त लगातार लयस्थित रह जाता है तो अणिमा नाम की सिद्धि उसे प्राप्त होती है जिससे अणुत्व प्राप्त किया जाता है ॥७६॥ आत्मन्येवात्मना लीनो योगी षोडशवासरान्³। लभते महिमासिद्धिं महारूपस्य धृग् यया⁴ ॥ ८० ॥ यदि योगी लगातार सोलह दिनों तक आत्मा में स्वयं लीन रहे तो 'महिमा' नाम की सिद्धि उसे प्राप्त होती है जिससे वह महान् रूप धारण करता है ॥ ८० ॥ अष्टादशदिनान्तं तु⁵ लयस्थो यदि तिष्ठति । गरिमाख्या भवेत् सिद्धिर्ययाभूभारधृग्⁶ भवेत् ॥ ८१ ॥ यदि योगी अठारह दिनों तक लगातार लयस्थ रहता है तो उसे 'गरिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह आवश्यकता पर भूमिका-सा भारीपन धारण कर लेता है ॥ ८१ ॥ अभिन्नार्थे लये वापि यश्च विंशतिवासरान्⁷ । लघिमाख्या भवेत्सिद्धिर्ययाणुत्वस्य⁸ भारधृक् ॥ ८२ ॥ जो योगी परतत्त्व में लगातार बीस अहोरात्र लीन रहता है उसे 'लघिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिसमे वह अणु का भार धारण कर लेता है ॥ ८२ ॥ १. (ख) चतुर्दशदिनानां च । २. (ख) अणिमाद्यष्टसिद्धिः स्याद० । ३. (ख) वासरात् । ४. (ख) स महारूपधृक् यथा । ५. (ख) अष्टादश दिनानां च । ६. (ख) गरिमाख्यां लभते सिद्धि यथा । ७. (ख) पंचविंशतिवासन् । ८. (ख) सिद्धिर्यथा ।