भारतकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

[ २१ ] द्वाविंशतिदिनान्येवं स्वलक्ष्ये विलयं गतः¹। प्राप्तिसिद्धिर्भवेत्तस्य प्रापयेद्धि जगत्स्थितिम् ॥ ८३ ॥ यदि योगी अपने लक्ष्यभूत परतत्त्व में इस प्रकार से लगातार बाईस दिनों तक विलय को प्राप्त होता है तो उसे 'प्राप्ति' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह सारे जगत् को स्थिति प्राप्त कराता है ॥ ८३ ॥ परे लयं गतो योगी चतुर्विंशतिवासरान् । तस्य प्राकाम्यसिद्धिः स्यादिच्छितं लभते ध्रुवम्² ॥ ८४ ॥ यदि योगी लगातार २४ दिनों तक परतत्त्व में लय को प्राप्त रहता है तो उसे 'प्राकाम्य' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे अवश्य ही उसे मनोभि- लषित पदार्थों की प्राप्ति होती है ॥ ८४ ॥ यस्यैवास्तगतं चित्तं षड्‌विंशतिदिनानि वै । लभते जगतीशित्वं³ येन विश्वगुरुर्भवेत् ॥ ८५ ॥ जिसका चित्त लगातार छब्बीस दिनों तक परतत्त्व में अस्त (लीन) रहता है वह जगत् में 'ईशित्व' नाम की सिद्धि प्राप्त करता है जिससे वह विश्वगुरु होता है ॥ ८५ ॥ अष्टाविंशत्यहान्यस्य⁴ लयस्तिष्ठेत् स्थिरात्मनः⁵ । वशित्वसिद्धिराप्तिः स्याद्ययावै वशयेज्जगत्⁶ ॥ ८६ ॥ जिस स्थिरात्मा योगिराज का लगातार अट्ठाईस दिनों तक पर तत्व में लय स्थायी रहता है उसे 'वशित्व' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह सम्पूर्ण जगत् को अपने वश में कर सकता है ॥ ८६ ॥ १. (ख) द्वाविंशतिदिनानि स्याल्लयक्षेपो लयंगतः । २. (ख) वशित्वं लभते तथा । ३. (क) जगदीशित्वम्' और (ख) 'जगदीशत्वम्' । ४. (क) और (ख) अष्टविंशत्यहर्यस्य । ५. (ख) लयस्थस्यस्थिरासने । ६. (ख) वश्यकृज्जगत्।

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक) · पृष्ठ 91, कुल 128 में से · BharatKosha