अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २२ ] गन्तुमिच्छन्ति ये केचित् परे ब्रह्मपदे लयम् । भवन्ति सिद्धयस्तेषां 'सर्वा विध्वंसकारिकाः ।'१ ८७ ॥ जो कोई महापुरुष परब्रह्म पद में लीन होना चाहते हैं उनके लिये ये पूर्वोक्त सब सिद्धियां सर्वनाशकारिणी होती हैं इसलिए उन्हें सिद्धियों की ओर आकृष्ट नहीं होना चाहिये ॥ ८७ ॥ मासमेकं लयो यस्य लग्नस्तिष्ठत्यखण्डितः२ । न जागर्ति स योगीन्द्रो यावन्मोक्षं' न विन्दति३ ॥ ८८ ॥ जिस योगी का एक मास तक लगातार अखण्डित लय रहता है वह योगिराज जब तक मोक्ष नहीं होता तब तक जागता नहीं है ॥ ८ ८ ॥ नवमासलयेनापि पृथवीतत्त्वं स विन्दति४ । पृथवीतत्त्वे तु५ संसिद्धे योगीन्द्रो वज्रसंनिभः ॥ ८६ ॥ नौ महीने तक के लय से योगिराज को पृथिवी तत्त्व का लाभ हो जाता है । पृथिवी तत्त्व के सिद्ध हो जाने पर योगिराज वज्र तुल्य देह हो जाता है अर्थात् उसकी काय-सिद्धि हो जाती है ॥ ८६ ॥ सार्धसंवत्सरेणापि लयस्थस्यापि योगिनः । तोयतत्त्वस्य सिद्धिः स्यात् तोयतत्त्वमयो भवेत्६ ॥ ६० ॥ डेढ़ वर्ष तक लगातार परतत्त्व में लीन योगी को जलतत्त्व की सिद्धि होती है जिससे योगी जलतत्त्वमय होता है ॥ ६० ॥ १. (ख) सर्वास्तेषां । २. (ख) मासमेकं लये यस्य लयस्तिष्ठेदखण्डितः । ३. (ख) यावन्मोक्षं स गच्छति । ४. (ख) स गच्छति । ५. (ख) पृथवीतत्त्वेति संसिद्धे । ६. (ख) तोयतत्त्वमयो हि सः ।