अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २३ ] संवत्सरत्रयेणापि लयस्थस्यापि योगिनः । तेजस्तत्त्वस्य सिद्धिः स्यात्तेजस्तत्त्वमयो भवेत्¹ ॥ ६१ ॥ तीन वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को तेजस्तत्त्व की सिद्धि होती है, जिससे वह तेजस्तत्त्वमय हो जाता है ॥ ६१ ॥ षड्भिः संवत्सरेरेवमखण्डलयसंस्थितः² । वायुतत्त्वस्य सिद्धिः स्यात् वायुतत्त्वमयो भवेत्³ ॥ ६२ ॥ इसी प्रकार छह वर्षों तक यदि योगी अखण्ड परतत्त्वलय में स्थित हो तो उसे वायुतत्त्व की सिद्धि होती है । वायुतत्त्व की सिद्धि से वह वायुतत्त्वमय हो जाता है ॥ ६२ ॥ तथा द्वादशभिर्वर्षैर्लयस्थस्य निरन्तरम् । व्योमतत्त्वस्य सिद्धिः स्याद् व्योमतत्त्वमयो भवेत्⁴ ॥६३॥ इसी प्रकार बारह वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को आकाश तत्त्व की सिद्धि होती है जिससे वह आकाश तत्त्वमय (सर्वव्यापक) हो जाता है ॥६३॥ चतुर्विंशतिभिर्वर्षैर्लयस्थस्य निरन्तरम् । शक्तितत्त्वस्य सिद्धिः स्याच्छक्तितत्त्वमयो भवेत्⁵ ॥६४॥ चौबीस वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को शक्तितत्त्व की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह शक्तितत्त्वमय हो जाता है ॥६४॥ ब्रह्माण्डसकलं पश्येत् करस्थमिव मौक्तिकम्⁶ । आत्मकायस्वरूपं च निर्धार्याथ यथेप्सितम्⁷ ॥ ६५ ॥ तदनन्तर वह (योगिराज) अपने शरीर का मनचाहा स्वरूप छांट कर अर्थात् अपना जैसी इच्छा हो वैसा स्वरूप बना कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को हथेली में रखे मोती के समान देखे ॥६५॥ १. (ख) तेजस्तत्त्वमयो हि सः । २. (ख) षड्भिः संवत्सरैर्भूतैरखण्डलयसंस्थिते । ३. (ख) वायुतत्त्व मयो हि सः । ४. (ख) व्योमतत्त्वमयो हि सः । ५. (ख) शक्तितत्त्वमयो हि सः । ६. (ख) ब्रह्माण्डान् सकलान् पश्येत्पाणिस्थमिव मौक्तिकम् । ७. (ख) निर्धार्याथ यथास्थितम् ।