अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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[ २४ ] कायस्थो दृश्यते लोके१ तत्त्वचर्यां समाचरेत् (चरन् ?) । तत्त्वचर्यां करोत्येव शक्तितत्त्वक्षयाय च ॥ ६६ ॥ कायस्थ ( शरीर स्थित ) योगी लोक में तत्त्वचर्या का आचरण करता हुआ दिखाई देता है क्योंकि शक्तितत्त्व के विनाश के लिए उसे तत्त्वचर्या अवश्य ही करनी पड़ती है ॥६६॥ इत्थं क्रमविवृद्धेन लयाभ्यासेन योगिनः । भुंजते परमानन्दं भुशुण्ड्यादिमहात्मवत् ॥ ६७ ॥ इस प्रकार क्रम से वृद्धि प्राप्त हुए लयाभ्यास से योगी भुशुण्डि आदि महात्माओं के तुल्य परमानन्द का भोग करते हैं ॥६७॥ ब्रह्मविष्णुमहेशानां प्रलयेष्वपि योगिनाम् । नास्ति पातो लयस्थानां महातत्त्वे विवर्तिनाम् ॥ ६८ ॥ ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के प्रलय होने पर महातत्त्व में अधिष्ठित लयस्थ योगियों का पात (विनाश) नहीं होता है ॥६८॥ इत्यमनस्कखण्डे२ ईश्वरपार्वतीसंवादे३ प्रथमोऽध्यायः ॥
१. (ख) लोको । २. (ख) पुस्तक पाठः, अमनस्केयोगशास्त्रे । ३. (ख) पाठः—ईश्वरवामदेवसंवादे ।