अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
[ १६ ] दशरात्रलयेनपि योगीन्द्रः स्वात्मनि स्थितः । यानि कानि च गुप्तानि१ महाचित्राणि पश्यति ॥ ७५ ॥ दस अहोरात्रव्यापी लय से स्वात्मनिष्ठ योगीन्द्र भाँति-भाँति के गुप्त महाश्चर्यों को देखता है ॥ ७५ ॥ २ततश्चैकादशाहेन३ लयस्थस्य जवोदयात् । मनसा सहितस्यापि गन्तुमिच्छति विग्रहः ॥ ७६ ॥ ग्यारह अहोरात्र तक लय में स्थित योगीन्द्र की मन के साथ-साथ काया की गति होती है ॥ ७६ ॥ द्वादशाहलयेनापि भूचरत्वं हि सिद्धयति । निमेषार्धप्रमाणेन४ पर्यटत्येव भूतले५ (लम् ?) ॥ ७७ ॥ बारह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को भूचरत्व की सिद्धि होती है जिसके कारण केवल आधे निमेष ( पलक मारने ) में सारे भूतल में चारो ओर घूम लेता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७७ ॥ ततस्त्रयोदशाहेन लयेनापि महाद्भुताम्६ । योगीन्द्रः खेचरीसिद्धिं लभते चिन्तनादपि७ ॥ ७८ ॥ तदनन्तर तेरह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को केवल चिन्तनमात्र ( ख्याल करने ) से अद्भुत खेचरी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ७८ ॥ १. (ख) सुगुप्तानि । २. (क) तथा । ३. (क) तस्य चैकादशाहेन लयस्थस्य जयोदयात् । ४. (क) निमिषार्धप्रमाणेन । ५. (ख) भूतलम् । ६. (क) और (ख) महाद्भुतम् । ७. (ख) चेतनादपि ।
[ २० ] चतुर्दशदिनान्तं तु¹ लयस्थो यदि तिष्ठति । अणिमाख्या च सिद्धिः² स्यादणुत्वं प्राप्यते यया ॥७६॥ यदि योगी चौदह दिन पर्यन्त लगातार लयस्थित रह जाता है तो अणिमा नाम की सिद्धि उसे प्राप्त होती है जिससे अणुत्व प्राप्त किया जाता है ॥७६॥ आत्मन्येवात्मना लीनो योगी षोडशवासरान्³। लभते महिमासिद्धिं महारूपस्य धृग् यया⁴ ॥ ८० ॥ यदि योगी लगातार सोलह दिनों तक आत्मा में स्वयं लीन रहे तो 'महिमा' नाम की सिद्धि उसे प्राप्त होती है जिससे वह महान् रूप धारण करता है ॥ ८० ॥ अष्टादशदिनान्तं तु⁵ लयस्थो यदि तिष्ठति । गरिमाख्या भवेत् सिद्धिर्ययाभूभारधृग्⁶ भवेत् ॥ ८१ ॥ यदि योगी अठारह दिनों तक लगातार लयस्थ रहता है तो उसे 'गरिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह आवश्यकता पर भूमिका-सा भारीपन धारण कर लेता है ॥ ८१ ॥ अभिन्नार्थे लये वापि यश्च विंशतिवासरान्⁷ । लघिमाख्या भवेत्सिद्धिर्ययाणुत्वस्य⁸ भारधृक् ॥ ८२ ॥ जो योगी परतत्त्व में लगातार बीस अहोरात्र लीन रहता है उसे 'लघिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिसमे वह अणु का भार धारण कर लेता है ॥ ८२ ॥ १. (ख) चतुर्दशदिनानां च । २. (ख) अणिमाद्यष्टसिद्धिः स्याद० । ३. (ख) वासरात् । ४. (ख) स महारूपधृक् यथा । ५. (ख) अष्टादश दिनानां च । ६. (ख) गरिमाख्यां लभते सिद्धि यथा । ७. (ख) पंचविंशतिवासन् । ८. (ख) सिद्धिर्यथा ।
[ २१ ] द्वाविंशतिदिनान्येवं स्वलक्ष्ये विलयं गतः¹। प्राप्तिसिद्धिर्भवेत्तस्य प्रापयेद्धि जगत्स्थितिम् ॥ ८३ ॥ यदि योगी अपने लक्ष्यभूत परतत्त्व में इस प्रकार से लगातार बाईस दिनों तक विलय को प्राप्त होता है तो उसे 'प्राप्ति' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह सारे जगत् को स्थिति प्राप्त कराता है ॥ ८३ ॥ परे लयं गतो योगी चतुर्विंशतिवासरान् । तस्य प्राकाम्यसिद्धिः स्यादिच्छितं लभते ध्रुवम्² ॥ ८४ ॥ यदि योगी लगातार २४ दिनों तक परतत्त्व में लय को प्राप्त रहता है तो उसे 'प्राकाम्य' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे अवश्य ही उसे मनोभि- लषित पदार्थों की प्राप्ति होती है ॥ ८४ ॥ यस्यैवास्तगतं चित्तं षड्विंशतिदिनानि वै । लभते जगतीशित्वं³ येन विश्वगुरुर्भवेत् ॥ ८५ ॥ जिसका चित्त लगातार छब्बीस दिनों तक परतत्त्व में अस्त (लीन) रहता है वह जगत् में 'ईशित्व' नाम की सिद्धि प्राप्त करता है जिससे वह विश्वगुरु होता है ॥ ८५ ॥ अष्टाविंशत्यहान्यस्य⁴ लयस्तिष्ठेत् स्थिरात्मनः⁵ । वशित्वसिद्धिराप्तिः स्याद्ययावै वशयेज्जगत्⁶ ॥ ८६ ॥ जिस स्थिरात्मा योगिराज का लगातार अट्ठाईस दिनों तक पर तत्व में लय स्थायी रहता है उसे 'वशित्व' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह सम्पूर्ण जगत् को अपने वश में कर सकता है ॥ ८६ ॥ १. (ख) द्वाविंशतिदिनानि स्याल्लयक्षेपो लयंगतः । २. (ख) वशित्वं लभते तथा । ३. (क) जगदीशित्वम्' और (ख) 'जगदीशत्वम्' । ४. (क) और (ख) अष्टविंशत्यहर्यस्य । ५. (ख) लयस्थस्यस्थिरासने । ६. (ख) वश्यकृज्जगत्।
[ २२ ] गन्तुमिच्छन्ति ये केचित् परे ब्रह्मपदे लयम् । भवन्ति सिद्धयस्तेषां 'सर्वा विध्वंसकारिकाः ।'१ ८७ ॥ जो कोई महापुरुष परब्रह्म पद में लीन होना चाहते हैं उनके लिये ये पूर्वोक्त सब सिद्धियां सर्वनाशकारिणी होती हैं इसलिए उन्हें सिद्धियों की ओर आकृष्ट नहीं होना चाहिये ॥ ८७ ॥ मासमेकं लयो यस्य लग्नस्तिष्ठत्यखण्डितः२ । न जागर्ति स योगीन्द्रो यावन्मोक्षं' न विन्दति३ ॥ ८८ ॥ जिस योगी का एक मास तक लगातार अखण्डित लय रहता है वह योगिराज जब तक मोक्ष नहीं होता तब तक जागता नहीं है ॥ ८ ८ ॥ नवमासलयेनापि पृथवीतत्त्वं स विन्दति४ । पृथवीतत्त्वे तु५ संसिद्धे योगीन्द्रो वज्रसंनिभः ॥ ८६ ॥ नौ महीने तक के लय से योगिराज को पृथिवी तत्त्व का लाभ हो जाता है । पृथिवी तत्त्व के सिद्ध हो जाने पर योगिराज वज्र तुल्य देह हो जाता है अर्थात् उसकी काय-सिद्धि हो जाती है ॥ ८६ ॥ सार्धसंवत्सरेणापि लयस्थस्यापि योगिनः । तोयतत्त्वस्य सिद्धिः स्यात् तोयतत्त्वमयो भवेत्६ ॥ ६० ॥ डेढ़ वर्ष तक लगातार परतत्त्व में लीन योगी को जलतत्त्व की सिद्धि होती है जिससे योगी जलतत्त्वमय होता है ॥ ६० ॥ १. (ख) सर्वास्तेषां । २. (ख) मासमेकं लये यस्य लयस्तिष्ठेदखण्डितः । ३. (ख) यावन्मोक्षं स गच्छति । ४. (ख) स गच्छति । ५. (ख) पृथवीतत्त्वेति संसिद्धे । ६. (ख) तोयतत्त्वमयो हि सः ।
[ २३ ] संवत्सरत्रयेणापि लयस्थस्यापि योगिनः । तेजस्तत्त्वस्य सिद्धिः स्यात्तेजस्तत्त्वमयो भवेत्¹ ॥ ६१ ॥ तीन वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को तेजस्तत्त्व की सिद्धि होती है, जिससे वह तेजस्तत्त्वमय हो जाता है ॥ ६१ ॥ षड्भिः संवत्सरेरेवमखण्डलयसंस्थितः² । वायुतत्त्वस्य सिद्धिः स्यात् वायुतत्त्वमयो भवेत्³ ॥ ६२ ॥ इसी प्रकार छह वर्षों तक यदि योगी अखण्ड परतत्त्वलय में स्थित हो तो उसे वायुतत्त्व की सिद्धि होती है । वायुतत्त्व की सिद्धि से वह वायुतत्त्वमय हो जाता है ॥ ६२ ॥ तथा द्वादशभिर्वर्षैर्लयस्थस्य निरन्तरम् । व्योमतत्त्वस्य सिद्धिः स्याद् व्योमतत्त्वमयो भवेत्⁴ ॥६३॥ इसी प्रकार बारह वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को आकाश तत्त्व की सिद्धि होती है जिससे वह आकाश तत्त्वमय (सर्वव्यापक) हो जाता है ॥६३॥ चतुर्विंशतिभिर्वर्षैर्लयस्थस्य निरन्तरम् । शक्तितत्त्वस्य सिद्धिः स्याच्छक्तितत्त्वमयो भवेत्⁵ ॥६४॥ चौबीस वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को शक्तितत्त्व की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह शक्तितत्त्वमय हो जाता है ॥६४॥ ब्रह्माण्डसकलं पश्येत् करस्थमिव मौक्तिकम्⁶ । आत्मकायस्वरूपं च निर्धार्याथ यथेप्सितम्⁷ ॥ ६५ ॥ तदनन्तर वह (योगिराज) अपने शरीर का मनचाहा स्वरूप छांट कर अर्थात् अपना जैसी इच्छा हो वैसा स्वरूप बना कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को हथेली में रखे मोती के समान देखे ॥६५॥ १. (ख) तेजस्तत्त्वमयो हि सः । २. (ख) षड्भिः संवत्सरैर्भूतैरखण्डलयसंस्थिते । ३. (ख) वायुतत्त्व मयो हि सः । ४. (ख) व्योमतत्त्वमयो हि सः । ५. (ख) शक्तितत्त्वमयो हि सः । ६. (ख) ब्रह्माण्डान् सकलान् पश्येत्पाणिस्थमिव मौक्तिकम् । ७. (ख) निर्धार्याथ यथास्थितम् ।
[ २४ ] कायस्थो दृश्यते लोके१ तत्त्वचर्यां समाचरेत् (चरन् ?) । तत्त्वचर्यां करोत्येव शक्तितत्त्वक्षयाय च ॥ ६६ ॥ कायस्थ ( शरीर स्थित ) योगी लोक में तत्त्वचर्या का आचरण करता हुआ दिखाई देता है क्योंकि शक्तितत्त्व के विनाश के लिए उसे तत्त्वचर्या अवश्य ही करनी पड़ती है ॥६६॥ इत्थं क्रमविवृद्धेन लयाभ्यासेन योगिनः । भुंजते परमानन्दं भुशुण्ड्यादिमहात्मवत् ॥ ६७ ॥ इस प्रकार क्रम से वृद्धि प्राप्त हुए लयाभ्यास से योगी भुशुण्डि आदि महात्माओं के तुल्य परमानन्द का भोग करते हैं ॥६७॥ ब्रह्मविष्णुमहेशानां प्रलयेष्वपि योगिनाम् । नास्ति पातो लयस्थानां महातत्त्वे विवर्तिनाम् ॥ ६८ ॥ ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के प्रलय होने पर महातत्त्व में अधिष्ठित लयस्थ योगियों का पात (विनाश) नहीं होता है ॥६८॥ इत्यमनस्कखण्डे२ ईश्वरपार्वतीसंवादे३ प्रथमोऽध्यायः ॥
१. (ख) लोको । २. (ख) पुस्तक पाठः, अमनस्केयोगशास्त्रे । ३. (ख) पाठः—ईश्वरवामदेवसंवादे ।
उत्तरार्ध श्रीवामदेव उवाच- भगवन् देवदेवेश परमानन्दसुन्दरम् । अपरं किंचिदाख्याहि भवता यदुदीरितम् ॥ १ ॥ श्रीवामदेव जी ने कहा—भगवन्, हे देवाधिदेव, आपने जो पहले कहा था उसी तरह का परमानन्ददायक वृत्तान्त कहने की कृपा कीजिये ॥१ ॥ श्री ईश्वर उवाच- बहिर्मुद्रान्वितं पूर्वं बहिर्योगेन तन्मयम् । अन्तर्मुद्राख्यमपरं तयोर्योग (ग:?) तदेव हि ॥ २ ॥ श्री महादेव जी ने कहा—हे मुने, पूर्वोक्त तारक और अमनस्क दो योगों में पूर्वयोग अर्थात् तारक योग बाहरी मुद्रा से युक्त होने के कारण बाह्ययोग अर्थात् बहिर्योगमय है दूसरा अर्थात् अमनस्क अन्तर्मुद्रा नामक है, अतएव वही यथार्थ योग है ॥ २ ॥
३. तृतीय अध्याय: सहज समाधि, जीवन्मुक्ति स्थिति एवं अमनस्क योग उपसंहार
[ २६ ] राजयोगः स कथितः स एव मुनिपुंगव । राजत्वात् सर्वयोगानां राजयोग इति स्मृतः ॥ ३ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ, वही राजयोग कहा गया है, क्योंकि वह सब योगों का राजा है, इसलिए राजयोग कहलाता है ॥ ३ ॥ राजानं दीप्यमानं तं परं ब्रह्माणमव्ययम् । देहिनः प्रापयेद् यस्तु राजयोगः स उच्यते ॥ ४ ॥ जो योग देहधारियों को राजा के तुल्य शोभायमान ( देदीप्यमान ) उस अव्यय परब्रह्म में पहुँचाता है, वह राजयोग कहलाता है ॥ ४ ॥ राजयोगस्य महात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः । ज्ञानात् सिद्ध्यति मुक्तिर्हि गुरोर्ज्ञानं च लभ्यते ॥ ५ ॥ हे मुनिवर, राजयोग का वास्तविक महात्म्य कौन जान सकता है ? उसके ज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है और गुरु से ज्ञान प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ अन्तर्योगं बहिर्योगं यो जानाति विशेषतः । मया त्वयाप्यसौ वन्द्यः शेषैर्वन्द्यस्तु किं पुनः ॥ ६ ॥ जो पूर्वोक्त अन्तर्योग और बहिर्योग को विशेषरूप से ( तत्त्वतः ) जानता है वह मेरा और तुम्हारा भी वन्दनीय है, औरों का वन्दनीय है इसमें तो कहना ही क्या है ? ॥ ६ ॥ चित्तं बुद्धिरहंकार ऋत्विक् सोमश्च पंचमः । इन्द्रियाणि दश प्राणान् जुहोति ज्योतिर्मण्डले ॥ ७ ॥ चित्त, बुद्धि, अहंकार, ऋत्विक् और पांचवां सोम—ये दस इन्द्रियों और प्राणों का ज्योतिर्मंडल में हवन करते हैं १ ॥ ७ ॥ १. देह में पांच तत्त्व हैं—चित्त, बुद्धि, अहंकार, ऋत्विक्, ( कर्म करनेवाली अस्मिता, एवं सोम ( अमृत, मन ) । ये पांचों होम करने वाले हैं । दश इन्द्रियाँ होम की सामग्रियाँ हैं ( हव्य हैं ) और ज्योतिर्मण्डल होम कुण्ड है ।
बद्धपद्मासन सर्वांगासन सिद्धासन उत्थान पद्मासन ( शक्ति-आसन )
योगमुद्रा चौरंगीपीठ ( दोलासन ) महायोगमुद्रा त्राटक
[ २७ ] तन्मूलान्नादिपर्यन्तं विभाति ज्योतिर्मएडलम् । योगिभिः सततं ध्येयमणिमाद्यष्टसिद्धिदम् ॥ ८ ॥ उनके मूलभूत अन्नादि पर्यन्त ज्योतिर्मण्डल शोभित होता है। उसका योगियों को सदा ध्यान करना चाहिए। वह अणिमा आदि सिद्धियाँ देने- वाला है ॥ ८ ॥ वेदशास्त्रपुराणानि सामान्यगणिका इव । एकैव शाम्भवी विद्या गुप्ता कुलवधूरिव ॥ ६ । वेद, शास्त्र और पुराण गणिका के तुल्य सर्वसाधारण हैं, सबकी उन तक पहुँच है, केवल एकमात्र शाम्भवी विद्या ही कुलवधू की तरह गुप्त है ॥६॥ अन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेषवर्जिता । एषा हि शाम्भवीमुद्रा सर्वशास्त्रेषु गोपिता ॥ १० ॥ यह शाम्भवी-मुद्रा अन्तर्लक्ष्यवाली, बहिर्दृष्टिवाली और निमेष और उन्मेष से शून्य है अर्थात् शाम्भवी मुद्रा में बहिर्दृष्टि होने पर भी अन्तर्लक्ष्य होता है और दृष्टि में निमेष और उन्मेष नहीं होते हैं। यह सब शास्त्रों में छिपाई गई है, गोपित है ॥ १० ॥ आदिशक्तिरूमाचैषा मत्तोन्मंवतीपुरा । अधुना जन्मसंस्कारात्त्वमेको लब्धवानसि ॥ ११ ! यह शाम्भवी-मुद्रा आदिशक्ति उमा रूप है, यह पहले मुझसे उत्पन्न हुई थी, इस समय जन्म संस्कार वश तुमने इसे प्राप्त किया है ॥ ११ ॥ गुह्याद् गुह्यतरा विद्या न देया यस्य कस्यचित् । एतज्ज्ञानं वसेद् यत्र स देशः पुएयभाजनम् ॥ १२ ॥ यह विद्या गुह्य से भी गुह्यतर ( अधिक गुह्य ) है । ६से किसी को नहीं देना चाहिए। यह ज्ञान जहाँ रहता है वह प्रदेश ( देह ) पुण्यदेश है, वह जन पुण्यात्मा है१ ॥ १२ ॥ १. 'देशः' के स्थान पर 'देहः' पाठ अच्छा मालूम होता है।
[ २८ ] दर्शनात् स्पर्शनात्तस्य त्रिसप्तकुलसंयुताः । जना मुक्तिपदं यान्ति किं पुनस्तत्परायणाः१ ॥ १३ ॥ उसके दर्शन और स्पर्श से अपने २१ पुश्तों के साथ लोक मुक्ति पद को प्राप्त होते हैं । उस देश के निवासी या जन के सेवकों की तो बात ही क्या है ? ॥ १३ ॥ नोर्ध्वाधः कुण्डलीभेद उन्मन्याश्चैव न क्रमः । अनुसन्धानमात्रेण योगोऽयं सिद्धिदायकः ॥ १४ ॥ इस योगमें ऊर्ध्वकुण्डली या अधःकुण्डलिनी भेद नहीं है। उन्मनी, मनो- न्मनी का भी क्रम नहीं है। यह योग केवल अनुसन्धान मात्र से २सिद्धि प्रदान करता है ॥ १४ ॥ ऊर्ध्वमुष्टिरधोदृष्टिरूर्ध्वभेदस्त्वध : शिराः । धरायन्त्रविधानेन जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥ १५ ॥ ऊपर की ओर मुष्टि, नीचे की ओर दृष्टि, ऊपर को भेद और नीचे की ओर सिर कर “धरायन्त्र” की विधि से साधक जीवन्मुक्त होगा ॥ १५ ॥ १. तुलनीय—कृतार्थौ पितरौ तेन धन्यो देशः कुलं च तत् । जायते योगवान् यत्र दत्तमक्षय्यतां व्रजेत् ॥ दृष्टः सम्भाषितः स्पृष्टः पुंप्रकृत्योर्विवेकवान् । भवकोटिशतापातं पुनाति वृजिनं नृणाम् ॥ (ब्रह्मवैवर्तपुराण) २. शास्त्रों में तीन प्रकार के योग का वर्णन है—(१) आणवयोग (२) शाक्त- योग और (३) शांभवयोग । आणवयोग में शरीर, प्राण, मन, बुद्धि को लेकर साधना होती है, जैसे कि आसन द्वारा देहजय, मुद्रा-बंध-प्राणायाम द्वारा प्राणजय, ध्यान द्वारा मनजय इत्यादि । जब कुण्डलिनी शक्ति जाग जाती है तब शाक्तयोग (शक्तिअनुसंधान) होता है । ऐसा होता है कि शक्ति सहस्रार में तो पहुँच गयी है किन्तु शिवत्वबोध नहीं है । इसलिये बोध करने का जो उपाय है वह शांभ- वयोग ( स्वरूप अनुसंधान ) है, जो अनुसंधानात्मक है ('शिवोऽहम्') ।
[ २६ ] कुलचाररताः सन्ति गुरवो बहवो मुने । कुलाचारविहीनस्तु गुरुरेको हि दुर्लभः ॥ १६ ॥ हे मुने, कौलों के आचार में रत बहुत से गुरु हैं, किन्तु कौलाचार से विहीन एक ही गुरु है उसका प्राप्त होना सरल नहीं है ॥ १६ ॥ पुष्पात् प्रकाशते यद्वत् फलं पुष्पविघातकम् । देहात्प्रकाशते तत्त्वं तत्त्वं देहविनाशकम् ॥ १७ ॥ जैसे फूल से फल प्रकट होता है परन्तु फल फूल का विनाशक है वैसे ही देह से तत्त्व प्रकट होता है पर तत्त्व देह का विनाशक है ॥ १७ ॥ फलप्रकाशकं पुष्पं फलं पुष्पविनाशकम् । तत्त्वप्रकाशको देहस्तत्त्वं देहविनाशकम् ॥ १८ ॥ फूल फल का प्रकाशक है, फल फूल का विनाशक है। देह तत्त्व की प्रकाशक है, तत्त्व देह का विनाशक है ॥ १८ ॥ तत्त्वमात्मस्थमज्ञात्वा मूढः शास्त्रेषु मुह्यति । गोपः कक्षगते छागे कूपे पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥¹ जैसे मूर्ख ग्वाला बकरी के बच्चे के बगल में रहते भी मूर्खतावश उसे कुएँ में झांकता फिरता है वैसे ही मूढ़ पुरुष अपने में स्थित तत्त्व को न जानकर शास्त्रों में मोह को प्राप्त होते हैं अर्थात् व्यर्थ शास्त्रों में भटकते हैं ॥ १६ ॥ नमोऽस्तु गुरवे तुभ्यं सहजानन्दरूपिणे । यस्य वाक्यामृतं हन्ति संसारमोहनामयम् ॥ २० ॥ सहजानन्द रूपी आप गुरु के लिए नमस्कार है जिनका वाक्य-रूपी अमृत संसार मोहरूपी व्याधि का विनाश करता है ॥ २१ ॥ १. अन्यत्र भी कहा है—शुष्कशास्त्रविवादेषु नैवायुः क्षपयेद् बुधः । नहि दीपकवार्तायामन्धकारो विनश्यति ॥
[ ३० ] अमृतोद्दीपिनी विद्या निरपाया निरंजना । अमनस्का कला कापि जयत्यानन्ददायिनी ॥ २१ ॥ यह अमनस्का विद्या अमरता को उद्दीप्त करनेवाली, कभी विनष्ट न होने- वाली और किसी भी प्रकार के कालुष्य से रहित है । यह आनन्दप्रदायिका लोकोत्तर कला सबसे उत्कृष्ट होने के कारण सर्ववन्दनीय है ॥ २१ ॥ प्राणाष्टोच्छ्वासनिःश्वासविध्वस्तविषयग्रहः । निश्चेष्टो निर्गतारम्भोह्यानन्द एव योगिनः ॥ २२ ॥ प्राण वायु के आठ उच्छ्वास और निःश्वासों से जिसमें रूप आदि विषयों का ग्रहण नहीं होता, जिसमें हस्त, पाद आदि अंगों की चेष्टाएँ नहीं होतीं अर्थात् निश्चलतायुक्त एवं किसी प्रकार का कार्यारम्भ जिसमें नहीं होता अर्थात् निष्क्रियता सम्पन्न आनन्द ही योगी का है ॥ २२ ॥ उच्छिन्नसर्वसंकल्पो निश्शेषाशेषचेष्टितः । स्वावगम्यो लयः कोऽपि जगतां वागगोचरः ॥ २३ ॥ जिसमें सब प्रकार के संकल्प छिन्न-भिन्न हो चुके हैं, सब चेष्टाएँ निःशेष गई हैं, केवल अपने अनुभव से ज्ञेय कोई अद्भुत लय लोगों की वाणी अगोचर है, उसका वाणी द्वारा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ॥२३॥ वदन्त्येव परं ब्रह्म बुद्धिमन्तो हि सूरयः । सर्वबोधकलालापकुशला दुर्लभा भुवि ॥ २४ ॥ बुद्धिमान् विद्वान् पुरुष परम ब्रह्म को वाणी से कहते भर हैं सबको बोध ( ज्ञान ) कराने की कला के आलाप में कुशल पुरुष पृथ्वी में दुर्लभ हैं । या सब बोधकलाओं ( ज्ञान कलाओं ) के उपदेश में कुशल पुरुष पृथ्वी पर दुर्लभ हैं ॥ २४ ॥ विन्दन्त्यनात्मनोऽभावं वेदान्तोपनिषद्विदः । रहस्यमुपदिश्यापि स्वयं नानुभवन्ति ते ॥ २५ ॥ वेदान्त उपनिषदों के मर्मज्ञ अनात्मा के अभाव को तत्त्व जानते हैं । वे उसका उपदेश देते हैं पर स्वयं उसका अनुभव नहीं करते हैं ॥ २५ ॥
[ ३१ ] विज्ञाय योगशास्त्राणि नानागुरुमतानि च । निबद्धः स्वावबोधो यं सद्यः प्रत्ययकारकः ॥ २६ ॥ विविध योगशास्त्रों का तत्त्व भलीभाँति जानकर तथा नाना गुरुजनों के मतों को भी भली प्रकार जानकर यह अमनस्क नामक स्वावबोध (आत्म- बोध) रचा गया है । यह सद्यः ज्ञानकारक है ॥ २६ ॥ सकलं समनस्कं च सापायं च सदा त्यज । निष्कलं निर्मनस्कं च निरायासं सदा भज ॥ २७ ॥ समनस्क जो सकल ( प्राणादि नामान्त कलाओं से युक्त ) और विनश्वर है, का सदा त्याग करो और निर्मनस्क ( अमनस्क ), जो [कलारहित और आयासविहीन है१, का सदा सेवन करो ॥ २७ ॥ दुग्धाम्बुवत् संमिलितौ तुल्यक्रियौ मानसमारुतौ च । यावन्मनस्तत्र मरुत्प्रवृत्तिर्यावन्मरुच्चापि मनः प्रवृत्तिः ॥२८॥२ मन और वायु दूध और जल की तरह परस्पर मिले हुए हैं उन दोनों की क्रिया भी एक सी ही है । उन दोनों में जब तक मन • रहेगा तब तक वायु की प्रवृत्ति भी रहेगी और जबतक वायु रहेगा तब तक मन की भी प्रवृत्ति रहेगी ॥ २८ ॥ तत्रैकनाशादपरस्य नाशः एकप्रवृत्तेरपरप्रवृत्तिः । अभ्यस्तयोरिन्द्रिय३ वर्गवृद्धिर्विध्वस्तयोर्मोक्षपदस्य सिद्धिः॥२९॥ उन दोनों में एक के विनाश से दूसरे का विनाश हो जाता है और एक की प्रवृत्ति से दूसरे की प्रवृत्ति होती है। उन दोनों के प्रवृत्त होने पर इन्द्रियवर्ग की वृद्धि ( रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श आदि की ओर अधिक आकर्षण ) होती है और उनके विध्वस्त होने पर मुक्ति प्राप्त होती है ॥ २९ ॥ १. 'निरपायम्' ऐसा पाठ मानने पर 'अविनाशी है' । यह अर्थ होगा । २. चले वाते चले चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ॥ (हठयोगप्रदीपिका२।२) ३. अभ्यस्तयोस्तत्र त्रिवर्गवृद्धिः इतिपाठः समीचीनः प्रतिभाति । अर्थात् मन और वायु के अभ्यस्त होने पर त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ और काम की वृद्धि होती है ।
[ ३२ ] तत्राप्य१साध्यः पवनस्य नाशः षडंगयोगादिनिषेवणेन । मनोविनाशस्तु गुरुप्रसादा- न्निमेषमात्रेण सुसाध्य एव ॥३०॥ उन दोनों में वायु का विनाश षडंग-योग आदि के कौशलके साथ सेवन से साध्य है और मन का विनाश तो श्री गुरुदेव के अनुग्रह से एक पलभर में ही सुसाध्य होता है ॥ ३० ॥ तस्मान्मनोनाशवतोऽमनस्कता यन्नाशतो नश्यति वायुरग्रे । तस्मात्सुबुद्धीन्द्रियदेहनाशा- दद्वैतबुद्धिः सहजस्थितस्य ॥३१॥ इसलिए जिसके मन का विनाश हो चुका उसे अमनस्कता ( अमनस्क योग ) प्राप्त है । मन के नाश के पहले वायु विनष्ट हो जाता है । वायु और मन के विनाश से बुद्धि, इन्द्रिय और देह का विनाश होने के कारण अमनस्क योगी को (सहजतत्त्व में स्थित योगी को) अद्वैतबुद्धि होती है ॥३१॥ जित्वा वायुं विविधकरणैः क्लेशमूलैः कथंचित्, कृत्वा यत्नं निजतनुगताशेषनाडीप्रचारान् । अश्रद्धेयां परपुरगतिं साधयित्वापि नूनम्, विज्ञानेऽपि व्यसनसुखिनो नास्ति तत्त्वस्यसिद्धिः ॥३२॥ कष्टकारी विविध साधनों से किसी प्रकार कठिनाई से वायु पर विजय प्राप्त कर और उसका प्रयत्नपूर्वक अपने शरीर की सम्पूर्ण नाडियों से संचार कर, अश्रद्धेय ( अविश्वसनीय ) परकायप्रवेश को असंदिग्ध रूप से सिद्ध कर विज्ञान में व्यसन से सुख माननेवाले भी अर्थात् विज्ञानार्जन में अत्यन्त परिश्रमशील साधक को तत्त्व की सिद्धि नहीं होती है ॥ ३२ ॥ १. थ।
[ ३३ ] केचिन्मूत्रं पिवन्ति स्वमलमथ तनौ केचिदुज्झन्ति लालां केचित्काष्ठां प्रविष्टा युवतिभगगतं विन्दुमूद्ध्र्वं नयन्ति। केचित्खादन्ति धातून् अखिलतनुशिरावायुसंचारदक्षा- नैतेषां देहसिद्धिर्विगतनिजमनोराजयोगादृते स्यात् ॥ ३३ ॥ कुछ अघोरपंथी अपना मूत्र पीते हैं, कोई अपना मल ग्रहण करते हैं, कोई अपने शरीर पर राख पोतते हैं, दुराचरण की पराकाष्ठा को प्राप्त हुए कोई युवती जनों के गुह्यांग की बूंदों को ऊपर खींचते हैं, कोई विविध प्रकार की धातुओं (रसों) का सेवन करते हैं और कोई शरीर की समस्त नाड़ियों में वायु का संचार करने में निपुण हैं परन्तु इन सबको कार्यसिद्धि प्राप्त नहीं होती । कार्यसिद्धि का अमनस्क ( जिससे अपना मन विलोन हो गया ऐसे ) राजयोग के सिवा दूसरा साधन नहीं है ॥ ३३ ॥ केचित्तर्कवितर्ककर्कशधियोऽहंकारदर्पोद्धताः केचिज्जातिगताभिमानभरिता ध्यानादिकर्माकुलाः । प्रायः प्राणिगणा विमूढमनसो नानाविकारान्विता दृश्यन्ते नहि निर्विकारसहजानन्दैकभोगाकुलाः ॥३४॥ नाना तर्कों के ऊहापोह से कर्कश बुद्धिवाले कोई लोग निविड़ अहंकार से उद्धत रहते हैं एवं कोई जातिगत अभिमानान्वित होकर ध्यान आदि कर्मों में व्यग्र रहते हैं । पृथ्वी पर प्रायः सभी प्राणी मूढमन ( विकृत मस्तिष्क ) हैं तथा नाना प्रकार की विकृतियों से युक्त हैं । एकमात्र निर्विकार सहजानन्द का उपभोग करनेवाले कोई नहीं दिखाई देते हैं ॥३४॥ एकदण्डत्रिदण्डादि जटाभस्मादिकं तथा । केशमुंचननग्नत्वे रक्तचीवर धारणम् ॥३५॥ उन्मत्ततामभोज्यान्नपानं पाखण्डवृत्तितः । इत्यादिर्लिंगग्रहणं नानादर्शनदर्शनम् ॥३६॥ कोई एक दण्डधारी हैं तो कोई त्रिदण्ड आदि धारण करनेवाले हैं, कोई जटाधारी हैं तो कोई सर्वाङ्ग में खूब भभूत रमाये हुए हैं, कोई मुण्डित-मस्तक ३
ावबोधस्य ह्युदासीनस्य सर्वतः । सदाभ्यासरतस्यैतेष्वेकम्प्युपयुज्यते(orएकमप्युपयुज्यते). Yes! एकमप्युपयुज्यते! Wait, is the dot an anusvara or just म? If someone wrote एकमप्युपयुज्यते, with a smudge, or एकम्प्युपयुज्यते. Let's write सदाभ्यासरतस्यैतेष्वेकम्प्युपयुज्यतेorसदाभ्यासरतस्यैतेष्वेकमेक...? Wait, look at the dot above म: it is right above the right vertical of म. That's where an anusvara sits on म. So सदाभ्यासरतस्यैतेष्वेकम्प्युपयुज्यते` is visually what's printed!
* Next verse:
`सदा दृष्टिविशेषांश्च विविधान्यासनानि च ।`
`अन्तःकरणभावश्च योगिनो नोपयोगिनः ॥३८॥`
* Hindi:
`सदा दर्शनविशेष अर्थात् निरन्तर विविध प्रकार की दृष्टियों का अभ्यास`
`( त्राटक आदि ), नाना प्रकार के आसनों का अभ्यास तथा अन्तःकरण भाव`
`( एकाग्रता का अभ्यास ) ये सब योगी के उपयोगी नहीं हैं ॥ ३८ ॥`
[ ३५ ] संकल्पमूलःध्यानादि चिन्ताशास्त्रे समाकुलाः । क्लेशेनापि न विन्दन्ति प्राप्तव्यस्थानमीप्सितम् ॥४०॥ संकल्पमूलक ध्यान आदि की विचार-चर्चा से भरे हुए शास्त्रों में श्राकुलमति लोग क्लेश से भी अपने अभीष्ट गन्तव्य स्थान को नहीं जान पाते हैं ॥ ४० ॥ वेदान्ततर्कोक्तिभिरागमैश्च नानाविधैः शास्त्रकदम्बकैश्च । ध्यानादिभिः सत्करणैर्नगम्यं चिन्तामणिं ह्येकगुरुं विहाय ॥४१॥ चिन्तामणिस্বরূপ एकमात्र गुरु के अनुग्रह के सिवा वेदान्त प्रतिपादित महावाक्यों के उपदेशों से, तर्कशास्त्र में प्रतिपादित युक्तियों के कथनों से, श्रागमों के अध्ययन से विविध प्रकार के अन्यान्य शास्त्रों के ज्ञानार्जन से ध्यानादि उत्तम साधनों से अपने गन्तव्य स्थान की प्राप्ति संभव नहीं है ॥४१॥ तस्मान्नूनं सकलविषया निष्कलाध्यात्मयोगाद् वायोर्नाशस्तदनु मनसस्तद्विनाशाच्च मोक्षः । स्याच्चेदेवं सहजममलं निर्विकारं निरीहं ज्ञात्वा यत्नं कुरुत कुशलाः पूर्वमेवामनस्के ॥४२॥ इसलिए यह निश्चित है कि सब विषय निष्कल अध्यात्मयोग से विनष्ट होते हैं। आत्मयोग से ही वायु का विनाश होता है, वायु विनाश के उपरान्त मन का विनाश होता है और मनके विनाश से मोक्ष होता है। यदि सहज, निर्मल, निर्विकार और निरीह आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर ऐसा होता हो तो हे कुशल पुरुषो, पहले ही अमनस्क के सम्बन्ध में अर्थात् अमनस्क प्राप्ति के लिए यत्न करो ॥ ४२ ॥ अभ्यस्तैः किमुदीर्घकालममलैर्व्याधिप्रदैर्दुष्करैः प्राणायामशतैरनेककरणैर्दुःखात्म कैदुर्जयैः।
[ ३६ ] यस्मिन्नभ्युदिते विनश्यति बली वायुः स्वयं तत्क्षणात् प्राप्त्यैतत्सहजं स्वभावमनिशं सेवध्वमेकं गुरुम् ॥ ४३ ॥ विविध व्याधियां उत्पन्न करनेवाले, बड़ी कठिनाई से करने योग्य, दुःखरूप, दुर्जय तथा अनेक साधनों से सम्पन्न होनेवाले सैंकड़ों प्राणायामों के सुदीर्घ काल तक अभ्यास करने से क्या लाभ ? जिसके उदित होने पर बलवान् वायु स्वयं तत्क्षण विनष्ट हो जाता है उसी सहज स्वभावभूत अमनस्क की प्राप्ति के लिए निरन्तर एकमात्र गुरु की सेवा करो ॥ ४३ ॥ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुदेवात्परं नास्ति तस्मात्तं पूजयत्सदा ॥ ४४ ॥ गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही देवाधिदेव महादेव हैं । गुरुदेव से बढ़कर दूसरा कोई नहीं है । इसलिए सदा गुरु की पूजा-अर्चा करनी चाहिये ॥ ४४ ॥ दृष्टिः स्थिरा यस्य विना निमेषाद् , वायुः स्थिरो यस्य विना निरोधात् । चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बात् , स एव योगी स गुरुः स सेव्यः ॥ ४५ ॥१ जिसकी निमेष ( पलक गिरने ) के बिना ही दृष्टि स्थिर हो, निरोध के बिना ही जिसका वायु स्थिर हो, बिना किसी अवलम्ब के जिसका चित्त स्थिर हो वही योगी है वही गुरु है, उसीकी सेवा करनी चाहिये ॥ ४५ ॥ अमनस्कं सुशिष्येषु संक्राम्येन्द्रियजं सुखम् । निवारयन्ते ते वन्द्या गुरवोऽन्ये प्रतारकाः ॥ ४६ ॥ जो सुशिष्यों में 'अमनस्क' को संक्रान्त कर इन्द्रियजन्य सुख को हटाते हैं, निवृत्त करते हैं वे गुरु वन्दनीय हैं उनसे अन्य गुरु-गुरु नहीं हैं वंचक हैं ॥४६॥ १. प्रथमखण्ड के १४ वें श्लोक में यही भाव व्यक्त है ।