भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४९

पंचवर्षसहस्राणि पादांगुष्ठेन तस्थिवान्। दिव्यवर्षसहस्रं तु धूमाह रो दशाननः ॥४८॥ पूर्णे वर्षसहस्रे स्वं शीर्षमग्नौ जुहाव सः। एवं वर्षसहस्राणि नव दशानिश्चक्रमुः॥४९॥ अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः। छेत्तुकामस्य धर्मात्मा प्रत्यक्षोऽभूत्प्रजापतिः॥५०॥ उवाच वचनं ब्रह्मा वरं वरय वांछितम्। ततोऽब्रवीद्दशास्यन्ममदत्त्वञ्च कुतोप्यहम्॥५१॥ सुपर्णनागयक्षेभ्यो देवेभ्यश्चासुरादपि। त्वत्तः शभोर्महाविष्णोर्मानुषा मे तृणोपमाः ॥५२॥ तथेत्युक्त्वा विधिस्तस्मै दश शीर्षाणि संददौ। विभीषणाय सद्बुद्धिममरत्वं ददौ मुदा ॥५३॥ विमोहितं सरस्वत्या देवेन्द्रपदकांक्षिणम्। कुंभकर्णं विधिः प्राह वरं वरय वांछितम् ॥५४॥ सोऽपि तं वरयामास निद्रां षण्मासिकीं शुभाम्। षण्मासीये चैकदिनेऽशनं ब्रह्माऽपि दत्तवान् ॥५५॥ ततोऽन्तर्धानमगमद्विधिस्तेऽपि गृहं ययुः। सुमाली वरलब्धांस्तान् ज्ञात्वा दौहित्रयन्मनान् ॥५६॥ पातालान्निर्गत्यः प्रायात्प्रहस्ताद्यैर्युतं सुखम्। मन्त्रिवाक्याद्दशग्रीवोऽपि निष्कास्य धनदं बलात्॥५७॥ लंकापुर्यां राक्षसँस्तु लंकाराज्यं चकार सः। धनदः पितुः पृष्ट्वा त्यक्त्वा लङ्कां महायशाः ॥५८॥ गत्वा कैलासशिखरं तपसाऽतोषयच्छिवम्। तेन सख्यमनुप्राप्य तेनैव परिनोदितः ॥५९॥ अलकां नगरीं तत्र निर्ममे विश्वकर्मणा। दिक्पालत्वमनुप्राप्य शिवस्य वरदानतः ॥६०॥ रावणो विद्युज्जिह्वाय ददौ शूर्पणखां तदा। पारिबर्हं ददौ तस्मै दंडकारण्यमुत्तमम् ॥६१॥ मातृष्वसुः सुतान् यंश्च त्रिशिरःखरदूषणान्। सहायतार्थं ददौ तस्मै तन्क्रान्ते तु मृतेऽचिरात्॥६२॥ कुंभीनसीं ददौ हृष्टां मधुदैत्याय रावणः। ददौ मधुवनं तस्मै पारिबर्हमनुत्तमम् ॥६३॥ खड्गजिह्वाय तां क्रौंचीं ददौ प्रेम्णा दशाननः। पटलङ्कां पारिबर्हे ददौ तस्यै मनोरमम् ॥६४॥


पावँके अंगूठेपर पाँच हजार वर्षतक खड़ा रहकर तप किया और दस हजार वर्षतक केवल धूम पीकर दशाननने तपस्या की ॥ ४३ ॥ ४८ । इस प्रकार वर्ष पूरे हो जानेपर वह अपना एक सिर काटकर अग्निमें होम देता था, ऐसा करते करते नौ हजार वर्ष बीत गये ॥ ४९ ॥ अब दस हजार वर्ष पूरे हुए और रावण अपना दसवाँ सिर काटकर आगमें हवन करनेके लिए तैयार हुआ, तब प्रजापति ब्रह्मा उसपर प्रसन्न हुए ॥ ५० ॥ ब्रह्माने कहा- हे वत्स ! तू अपना इच्छित वर माँग । तब रावणने कहा कि मैं गरुडय, सर्पाम यक्षांस, देवताओंसे, असुरोंसे आप (ब्रह्मा) से, शंभुसे तथा विष्णुसे भी अवध्यत्वका वर माँगता हूँ और मनुष्य तो मेरे लिए तिनकेके बराबर हैं ॥५१। ५२॥ तथास्तु कहकर ब्रह्मा ने रावणको दस सिर दिये और विभीषणको सुबुद्धि तथा अमरत्व दिया ॥ ५३ ॥ इन्द्रपदकी इच्छा रखनेवाले कुम्भकर्णसे ब्रह्माने कहा कि अपना अभिलषित वर माँगो ॥ ५४ ॥ तब सरस्वतीके द्वारा माहमें पडकर कुम्भकर्ण ने महान् तककी न द माँगा। तदनन्तर ब्रह्माने उसको छः महीनेतक सोना और फिर भोजन करना तथा छः महीनेतक फिर शयन का वर दिया ॥ ५५ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और वे लोग भी अपने घर चले गये। सुमाली अपने दौहित्रों को वर प्राप्त किए हुए जानकर प्रहस्त आदिके साथ पातालसे निकलकर निर्भय माध्यम पृथ्वीपर विचरने लगा सुमन्त्रीके कथनानुसार रावण लंकासे कुबेरको निकलवा दिया और वहाँ स्वयं राक्षसोंको लेकर लंकाका राज्य करने लगा। तब महान् यशस्वी कुबेरने अपने पिता से पूछकर लङ्काको छोड़ दिया और कैलासके शिखरपर जाकर तपश्र्चर्यासे शिवको प्रसन्न किया । उन्होंने उनसे मित्रता जोड़ी और उन्हें के कहनेसे वहाँ विश्वकर्मा द्वारा अलका पुरी बनवायी और शिवजीके वरदानसे दिक्पालकी पदवी प्राप्त की ॥ ५६-६०। बादमें रावणने अपनी शूर्पणखा नामकी बहिन विद्युज्जिह्वको ब्याह दी और उत्तम दण्डकारण्य उसको दहेजमें दे दिया ॥ ६१ ॥ थोडे ही दिनों बाद जब उसका पति मर गया । तब रावणने अपनी मौसीके लड़के त्रिशिरा खरदूषण आदिको उसकी सहायताके लिए भेजा ॥ ६२ । रावणने कुम्भीनसी नामकी बहिन मधु दैत्यको ब्याही तथा श्रेष्ठ मधुवन उसको दहेजमें दिया ॥ ६३ ॥ दशाननने अपनी क्रौंची नामकी बहिन खङ्गजिह्व राक्षसको