भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 166
१५०आनन्दरामायणे[सर्ग १३]

वैरोचनस्य दौहित्रीं वृत्तज्वालेति विश्रुताम् । स्वयंदत्तां मुदोद्वाह कुम्भकर्णाय रावणः ॥६५॥
गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मनः । विभीषणस्य भार्यार्थे सरमां स मुदाऽवहत् ॥६६॥
ततो मन्दोदरी पुत्रं मेघनादमजीजनत् । जातमात्रस्तु यो नादं मेघवत्प्रचकार ह ॥६७॥
तः सर्वऽप्यदन्मेघनादोऽयमिति वै जनाः गुहायां कुम्भकर्णोऽपि निद्राव्याप्तो विनिद्रितः ॥६८॥
ततः स रावणश्चापि देवगन्धर्वकिन्नरान् हत्वा क्रोधोद्धतान्नागान् स्त्रियस्तेषामपाहरत् ॥६९॥
धनदोऽपि च तच्छ्रुत्वा रावणस्याक्रमं तदा । अधर्मं मा कुरुष्वेति दूतवाक्यैर्न्यवारयत् ॥७०॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो जगाम धनदालयम् । विनिर्जित्य धनाध्यक्षं जहार तस्य पुष्पकम् ॥७१॥
अलकायां यदाऽऽसीन्मे सेनया रावणस्तदा निशायमेकदा भ्रातुः कुबेरस्य सुतेन हि ॥७२॥
प्रार्थिता सा पुरा रम्भा मकार नियतं दिनम् अज्ञानवृत्त्या वेगेन ययौ क्वानन्नुपुरस्वना ॥७३॥
रावणोऽपि च तां दृष्ट्वा बलादेव प्रभुक्तवान् चिगन्मुक्ताऽथ वृत्तं सा कीवेरं सन्यवेदयत् ॥७४॥
क्रुद्धः सोऽपि ददौ शापं रावणाय महात्मने । अवारभ्य दशास्यश्चे द्वेग्तां स्त्रियमूत्तमाम् । ७५।।
हठाद्भोक्ष्यति चेत्तर्हि क्षणमात्रान्मरिष्यति । इति शापं रावणोऽपि शुश्राव चरवाक्यतः ॥७६।
तदारभ्य स्त्रियं काममनिच्छन्तीं न धर्षयेत् ततो यमं च वरुणं निर्जित्य समरेऽसुरः ॥७७।
स्वर्गलोकयगात्तूर्ण देवराजजिघांसया । ततो रावणमभ्येत्य बबन्ध त्रिदशेश्वरः । ७८।।
तच्छ्रुत्वा सहसाऽऽगत्य मेघनादः प्रतापवान् । कृत्वा युद्ध महाघोरं जित्वा त्रिदशपुङ्गवम् । ७९।।
इन्द्रं धृत्वा दृढं बद्ध्वा मेघनादो महाबलः । मोचयित्वा स्वपितरं गृहीत्वेन्द्रं ययौ पुरीम् ॥८०॥
ब्रह्मा त मोचयामास देवेन्द्रं मेघनादतः । दत्त्वा वरान्त्राक्षसाय ब्रह्मा स्वभवनं ययौ ॥८१॥

दी तथा उसको दहेज़में अविचल मनोहर पद्मलका पुरी दे दी । ६४ । वैरोचनकी दोहित्री (नतिनी) प्रसिद्ध वृत्तज्वालाका उसके पिताने कुम्भकर्णके लिये रावणका दंर ६५ । महात्मा गन्धर्वराज शैलूषकी सुता सरमाको रावण विभीषणके लिय ल आया ६६ ।। तदनन्तर मन्दोदरीसे मेघनाद पुत्र उत्पन्न हुआ। जो कि पैदा होनेके साथ हो मेघकी तरह गर्जन करने लगा था । ६७। इसीलिये सब लोग उसका मेघनाद कहने लगे । कुंभकर्ण गुफामें जाकर सो गया । ६८ । उधर रावण देव, गन्धर्व, किन्नर, ऋषीश्वर और नागोंको मार मारकर उनकी स्त्रियोंका अपहरण करने लगा ।। ६९ ।। जब कुबेरने रावणका इस प्रकार दुराचार सुना, तब उन्होंने अपने दूतों द्वारा कहला भेजा कि हे रावण ! तू ऐसा अधर्म करना छोड़ दे

७० ।। यह सुना ही रावण और भी क्रुद्ध होकर कुबेरके यहाँ गया तथा उनको जीतकर पुष्पक विमान छन लाया ।। ७१ ।। जब रावण अपनी सेनाके साथ अलकापुरीमें था । उसी समय रावणके भाई कुबेरके पुत्र नलकूबरकी प्रार्थना स्वीकार करके रम्भा अप्सरा युद्धके वातावरनको न जाननेके कारण एकाएक नियत दिनपर आकाशसे वहीं आ पहुँची । उसके पैरोंमें सुन्दर एवं मनोहर नूपुरकी ध्वनि हो रही थी । ७२ । रावणने उसको सहसा देखकर उसके साथ हठात् भोग किया । बहुत देरके बाद उससे मुक्त हो रम्भाने जाकर वह सब हाल कुबेरके पुत्रको कह सुनाया ॥ ७३ ।। तब क्रुद्ध नलकूबरने रावणको शाप देते हुए कहा--' हे दशास्य ! आजसे यदि तुम किसी भी तुमको न चाहनेवाली सती स्त्रीसे हठात् भोग करोगे तो उसी क्षण मर जाओगे ।' इस शापको दूतके मुखसे रावणने भी सुन लिया । ७४ ॥ ७५ ॥ तबसे रावणने अपनेसे विमुख स्त्रीका अपमान करना छोड़ दिया । तदनन्तर युद्धमे यमराज तथा वरुणको जीतकर वह देवराज इन्द्रको मारनेकी इच्छासे शीघ्र ही स्वर्ग गया । त्रिदशेश्वर इन्द्रने रावणके सामने जाकर उसको कैद कर लिया ।। ७६-७८ ।। पिताको कैद किया हुआ सुनकर प्रतापी मेघनाद शीघ्र वहीं आ पहुँचा तथा भयानक युद्ध करके इन्द्रको जीत लिया ।। ७९ ।। तब महाबलवान् मेघनादने अपने पिता-को छुड़ा लिया और इन्द्रको पकड़ तथा बांधकर अपने नगरमें ले आया ।। ८० ।। पश्चात् ब्रह्माने इन्द्रको