श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १३ ] उत्तरकाण्डम् १५१
इन्द्रजिन्नाम तस्याभून्नराधिप शृणुष्व तत् । रावणादपि यश्चासीद्वलिष्ठः समरप्रियः ॥८२॥ मेघनादादयश्चेति तस्मान्प्रोक्तं तवाग्रतः । एतन्मुनीश्वरैः पूर्वं तन्निमित्त मयेरितम् ॥८३॥ रावणो विजयी लोकान्सर्वान् जित्वा क्रमेण तु । जित्वा वह्निं निरृतिं च वायुमीशं ययौ मुदा ॥८४॥ कैलासं तोलयामास बाहुभिः परिघोपमैः । तदा भीता शिवं देवी दोर्भ्यां सा परिषस्वजे ॥८५॥ शिवोऽपि वामपादाङ्गुष्ठेन कैलासमुद्धर्नि । भारं दत्त्वा गिरिं त्वेवं चकाराधः शनैः शनैः ॥८६॥ तदा तद्गिरिमग्नप्रबलिसन्धिषु दोर्लताः । विंशत्यपि रावणस्य न ता अगमन्बहिः क्षणात् ॥८७॥ स तेनाक्रन्दयामास स्तम्भसम्बद्धचोरवत् । तदा नन्दीश्वरेणापि शप्तोऽयं राक्षसेश्वरः ॥८८॥ यच्चलं कर्म यस्यास्ते कपितुल्यमतोऽसुर । वानरैर्मानुषैश्चैव नाशं गच्छसि कोविदैः ॥८९॥ ततः कालान्तरेणाथ शम्भुनैव विमोचितः । शप्तोऽप्यगणयन्वाक्यं ययौ हैहयपत्तनम् ॥९०॥ बहिर्गतं नृपं श्रुत्वा सहस्रार्जुननामकम् । मध्याह्ने रावणश्चक्रे रेवायाँ शिवपूजनम् ॥९१॥ अधस्तस्मान्नर्मदायां भुजपार्यैश्च सेतुवत् । स्तम्भयामास नीरौघं जलक्रीडां गतोऽर्जुनः ॥९२॥ चेष्टितोऽयुतनारीभिस्तत्तोयं रावणं तदा । प्लावयामास ध्यानस्थं ज्ञातस्तत्कर्मचार्जुनः ॥९३॥ मुक्त्वा ध्यानादिकं सर्वं युद्धं चक्रेऽर्जुनेन सः । तेन बद्धो दशग्रीवः कण्ठे रन्तुं सुताय तम् ॥९४॥ ददौ दशाननं प्रीत्या काष्ठनिर्मितहस्तिवत् । कियत्कालान्तरेणैव पुलस्त्येन स मोचितः ॥९५॥ ततोऽतिबलमासाद्य जिघांसुर्हरिपुङ्गवम् । गतो ध्यानमपीनं पश्चाद्वां शनैर्ययौ ॥९६॥ धृतस्तेनैव कक्षेण वालिना दशकन्धरः । भ्रामयित्वा तु चतुरः समुद्रान् रावणं द्रुतं ॥९७॥
मेघनादसे छुड़ाया और राक्षसोंको वर देकर ब्रह्मा अपने भवनको चले गये ॥ ८१ ॥ हे रघूत्तम ! तबसे मेघनाद-का इन्द्रजित् नाम पड़ा । जोकि रावणसे भी अधिक बलवान् तथा युद्धन था ॥ ८२ ॥ इसलिये मैने आपके सामने मेघनादका पहिले नाम लिया । इस ऋषियोंने इसका कारण पहले ही बता दिया था ॥ ८३ ॥ विजयशील रावणने क्रमशः सब लोकोंको जीतकर वह्नि निर्ऋति, वायु तथा ईशानको जीत लिया और बादमें अपनी अर्गलाके समान भुजाओंसे कैलास पर्वतको उठाने लगा । उस समय डरकर पार्वती देवी शिवजी से लिपट गयी ॥ ८४ ॥ ८५ ॥ पश्चात् शिवने अपने बायें पांवके अङ्गूठेसे उस पर्वतको दबा दिया । जिससे कैलास धीरे धीरे नीचे धंसने लगा ॥ ८६ ॥ उस समय पर्वतके नीचे आ जानेसे रावणकी बीसों भुजायें दब गयीं और वह खम्भेसे बँधे हुए चोरकी तरह चिल्लाने लगा । उस समय नन्दीश्वरने भी रावणको शाप देते हुए कहा- ॥ ८७ । ८८ ॥ हे असुर ! तुम्हारेसे बानरके समान चंचलता होनेके कारण युद्धवानोंगे तथा मनुष्योंसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी ॥ ८९ । बहुत कालके बाद शिवजीने उसे छुड़ा दिया । छूटनेके साथ ही वह शापको भूल गया और शिवजीके वचनका तिरस्कार करके युद्ध करनेके लिए हैहयराजके नगरको गया ॥ ९० । वहाँ जाकर पूछने तां ज्ञात हुआ कि सहस्रार्जुन नामवाला वहाँका राजा वहाँ उपस्थित नहीं है । तब रावण नर्मदा नदीके किनारे जाकर दसके बीचमें एक टापूपर बैठकर मध्याह्न समयम शिवजीका पूजन करने लगा । ९१ ॥ उससे नीचकी ओर राजा सहस्रार्जुन जलक्रीड़ा कर रहा था । उसने अपनी भुजारूपी सेतुसे खेल-खलम उस नदीके जलप्रवाहको रोक दिया । उस समय हजारों स्त्रियाँ उसे घेरकर जलक्रीड़ा कर रही थीं । परन्तु उस जलप्रवाहके रुक जानेसे शिवके ध्यानमे स्थित रावण जलमें बहने लगा । इस घटनाको देखकर उसने जान लिया कि यह काम सहस्रार्जुनका है । यह जानत ही वह तुरन्त ध्यान छोड़कर सहस्रार्जुनके पास गया और उनको युद्धके लिए ललकारने लगा । तब उसने रावणके गलेमें रस्सी डालकर बांध लिया और अपने पुत्रको खेलनेके लिए लकड़ीके बने हुए हाथीकी तरह दे दिया । कुछ दिनोंके बाद पुलस्त्य मुनिने जाकर उसको वहींस छुड़ाया ॥ ९२-९५ ॥ बादमें रावण बल संचय करके वानरश्रेष्ठ बालिको मारनेकी इच्छासे समुद्रके किनारे ध्यान धरकर बैठे हुए वानरराजके पास जाकर धीरेसे पीछे