भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

किष्किन्धां स्वां ययौ वेगादग्रे दृष्ट्वांगदं शिशुम्। प्रीत्या तं चुंबनं दातुं दोर्भ्यां कण्ठे न्यवेशयत् ॥९८॥ तदा बाहोश्चलनात्काक्षाद्यः पतितो भुवि। तं दृष्ट्वा स्वजनान् स्वीय दर्शयामास वै मुदा ॥९९॥ प्रेङ्खस्योपरि पुत्रस्य बबन्धाधोमुखं चिरम्। आत्मानमाङ्कदमूत्रस्य धारामीशाननोऽसुरः। १००॥ स्वयमेव ततो बाली बहुकाले गते मयि। ददवाज्ञां दशान्याय तेन सख्यं चकार सः। १०१॥ रावणः स पुनः स्थित्वा पुष्पंके व्यचरत्सुखम्। पश्यन्नानाविधान्वीरान् ययौ पातालमुत्तमम्॥ १०२॥ तत्र दृष्ट्वा पुरं रम्यं बलेः कोटिरविप्रभम्। तत्तजसाहतेऽहस्तत्पुष्पकं न चचाल वै ॥१०३॥ ततः स्वयं ययौ तूर्णामक एव दशाननः। पुरं प्रविश्य तद्द्वारि त्वां ददर्श च वामनम् १०४॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं पीतकौशेयवासमम्। चतुर्भुजं सपतनीकं द्वाररक्षणतत्परम् ॥१०५॥ त्वां प्राह स दशग्रीवः कोऽत्र राजाऽस्ति मां वद। तूष्णीं स्थितो वामनस्त्वमपि नोत्तरं रिपोः। १०६॥ तदा त्वां बधिरं मन्वा स विवेश बलेर्गृहम्। तत्र दृष्ट्वा बलिं पत्न्या सार्धं क्रीडनकण्डुकम् ॥१०७॥ तस्थौ तत्र भृशं तूष्णीं बलेर्लक्ष्मीं व्यलोकयत्। तावद्दूरे बलेर्हस्तात्क्रीडापासोऽपतद्भुवि ॥१०८॥ तमानेतुं रावणाय बलिराज्ञापयत्तदा। रावणोऽपि तमानेतुं ययौ पासांतिकं जवात्। १०९॥ प्रोच्चचाल भुवः पासं करेण न चचाल सः। विंशदोर्भिः क्रमेणायं यावत्पास प्रचालयत् ॥११०॥ तावदंगुलयः सर्वाः पासभारेण पीडिताः। न निष्क्रमुः पासतलाच्चूर्णिता रुधिराप्लुताः ॥१११॥ सदा चुक्रोश दीनं स विह्वल दशाननः। ततो विहस्य दास्या तं पायमानीय वै बलिः ॥११२॥ धिग्धिक्कृत्या रावणं तं गृहान्निष्क्रामयद्बहिः। ततो धृतो राजहंसस्तदुच्छिष्टैस्तु पोषितः ॥११३॥


की ओर जा खड़ा हुआ ॥९६॥ तब वालीने उसको कांखत उलटा दबाकर चारों समुद्रोंके भीतरफि घुमाया ॥९७॥ पश्चात् अपनी किष्किन्धा पुरीमें ले गया। वहां जाकर उसने अपने पुत्र अङ्गदको देखा। ज्यों ही वह अङ्गदके प्रेममें चूमनेके लिए अपनी भुजाओंमें उसे कण्ठपर बैठाने लगा ॥ ९८ । त्यां ही हाथोंके हिलनेसे रावण कांखमे से निकलकर गिर पड़ा। तबो उसको अपने प्राणप्रतापूर्वक स्वजनोंको दिखलाने लगे ॥९९॥ उसके ऊपर पुत्र अङ्गदका पालना बांधकर नीचे रावणका मुख करके उन्होंने बहुत दिनोंतक बांधकर रक्खा। जिससे रावणका मुख अङ्गदका मूत्रधरामं डूबता रहा। १००॥ तदनन्तर स्वयं बलीने ही रावणको जानेकी आज्ञा दे दी और उससे मित्रता कर ली ॥ १०१॥ रावण पुनः पुष्पक विमानपर सवार होकर आनंदके साथ विचरने लगा। अनेक वीरोंको देखता हुआ वह पातालम जा पहुँचा॥ १०२॥ वहाँ कोटिसूर्यके सदृश प्रकाशमयो उस नगरीके तेजसे प्रतिहत होकर पुष्पय विमानकी गति रुक गया ॥ १०३ । तब उससे उतरकर दशानन चुपचाप अकेला ही पुरीकी ओर चल पड़ा। उसने पुरॉमें प्रवेश करने-के बाद वामनरूपधारी आपका देखा ।१०४॥ करारों सूर्यके समान तेजस्वी आपने पीताम्बर धारण कर रक्खा था। आप चतुर्भुज होकर लक्ष्मीके साथ वहीं रहते हुए राजा बलिके द्वारकी रक्षा कर रह थे ॥ १०५ ॥ उस दशग्रीवन आपसे पूछा कि इस नगरका राज कौन है, बताओ। रावण कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा, पर आपने उसे अपना शत्रु समझकर कुछ उत्तर नहीं दिया ॥ १०६ ॥ तब आपको बधिर समझकर वह बलिक भवनमें घुसा। वहाँ उसने राजा बलिकी अपनी स्त्रीके साथ चौसर खेलत देखा। १०७। वहां चुपकेसे खड़ा होकर वह बलिकी राज्यलक्ष्मीको क्षणभर देखता रहा। इतनेमें राजा बलिके हाथसे छूटककर पाँसा दूर जा गिरा ॥ १०८। उसी समय बलिने रावणको उस पांसेको उठा लानेके लिए कहा रावण भी उसे उठानेके लिये शीघ्र ही उसके पास जा पहुँचा ॥ १०९॥ वह उसे एक हाथसे उठाने लगा। पर वह पाँसा हिल्ल तक नहीं। तब रावणने दो, तीन, चार करके बीसों हाथोंमें उस पाँसेको उठानेकी चेष्टा की, परन्तु तौ भी वह नहीं हिला ॥ ११० ॥ प्रत्युत उसके सब हाथोंकी अंगुलियाँ पाँसेके वाससे दब गयीं और कुचल जानेसे खून निकलने लगा परन्तु वे निकलीं नहीं । १११ । अतएव दशानन बहुत जोरसे चिल्लाने लगा। तब