भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

सर्गः ११ ] सारकाण्डम् १५४


अश्वानां शकृतं नीत्वा क्षिपत्प्रत्यहं बहिः । एकदा द्वारे गत्वा प्रार्थयामास त्वां मुहुः ॥ ११४ ॥
त्वया स्वपादलग्नः स्वपदांगुष्ठेन खेडितः । तदाऽतिमुदितो लंकां चिरकालेन रावणः ॥ ११५ ॥
ययौ मेने निजं जन्म द्वितीयं जातमद्य वै । रावणः परमप्रीत एव लोकान्मनावशन् ॥ ११६ ॥
कर्तुं वांस्त्वनवशाञ्जिग्ये व्यभ्राम पुष्पकस्थितः ।
दृष्ट्वैकदाऽत्र साकेते पूर्वजं तव दीक्षितम् ॥ ११७ ॥
अनरण्यं संगरेण चकार पतितं रणे ।
तदा शप्तोऽनरन्येन मद्वंशे रघुनन्दनः ॥ ११८ ॥
भूत्वा त्वां सगरेणैव सकुटुम्बं बधिष्यति इत्युक्त्वा स गतो नाकं रावणोऽपि पुरीं ययौ ॥ ११९ ॥
सनत्कुमारमेकांते स राक्षसोंऽथैकदासुरः । नत्वा पप्रच्छ देवेषु को वा श्रेष्ठेति सादरम् ॥ १२० ॥
मुनिः प्राह महाविष्णुं तच्छ्रुत्वा प्राह तं पुनः ।
विष्णुना ये हता युद्धे राक्षसाद्या लभंति काम् ॥ १२१ ॥
गतिं चेति मुनिः प्राह ते मुक्तिं यांति दुर्लभाम् ।
पुनः पप्रच्छ तं नत्वा केनोपायेन वै हरेः ॥ १२२ ॥
भविष्यत्यत्र मे मृत्युस्तदा तं मुनिरब्रवीत् । त्रेतायां नररूपेण रामो विष्णुर्भविष्यति ॥ १२३ ॥
अयोध्यायां तदा तेन कृत्वा वैरं सुदारुणम् । तस्माद्वधं कुरुष्व स्वमात्मनः परमात्मनः ॥ १२४ ॥
तेन गच्छसि मुक्तिं त्वं तच्छ्रुत्वा स दशाननः ।
विरोधार्थं जनकजामहरद्गौतमीनटात् १२५ ॥
अशोके रक्षिता तेन मातृवत्स्ववधेच्छया ।


राजा बलिकी एक दासीने शीघ्र बलिको उठाकर राजाको दे दिया ॥ ११२ ॥ बलिने उसी समय रावणको धिक्कार-कर अपने महलसे निकाल दिया। बाहर राजा बलिके दूतोंने उसको फिर पकड़ लिया और अपने जूठनसे उसका पोषण करने लगे ॥ ११३ ॥ रावणको गोदामेली लींड उठा-उठाकर बाहर फेंक आनेका काम सौंपा गया। कुछ दिनों बाद एक दिन रावण द्वारपर स्थित आप विष्णुके पास आकर नगरके बाहर जाने देनेकी प्रार्थना करन लगा और आपके चरणोंपर गिर पड़ा। तब आपने अपने पाँवके अङ्गूठेसे उसको आकाशकी ओर उछाल दिया। जिससे रावण बहुत कालके बाद प्रसन्नतापूर्वक अपनी लङ्कामे जा पहुँचा ॥ ११४ ॥ ११५ । वह आज मेरा दूसरा जन्म हुआ है, ऐसा मानने लगा। तब वही रावण पुनः प्रसन्न होकर पूर्ववत् सब लोकोंको अपने वशमे करनेकी इच्छासे पुष्पकपर चढ़कर नित्यप्रति इधर उधर भ्रमण करन लगा। उसने एक दिन अयोध्यामे आपके पूर्वज दीक्षित ( सोमयागकी दीक्षा लिये हुए ) राजा अनरण्यको देखा। उनके साथ युद्ध करके रावणने रणमे उन्हे हरा दिया। तब अनरण्यने उसको शाप दिया कि मेरे वंशमे जन्म लेकर रघुनन्दन राम सकुटुम्ब तुमको मारेंगे ॥ ११६ । ११८ । इतना कहकर वे स्वर्ग सिधार गये तथा रावण अपने नगरको चला गया ॥ ११९ ॥ उस राक्षसने एक दिन सनत्कुमारको नमस्कार करके एकान्तमें पूछा-हे मुने ! कृपा करके मुझे यह बताइए कि देवताओंमे सबसे श्रेष्ठ देवता कौन है ? ॥ १२० ॥ मुनिने विष्णुको श्रेष्ठ बताया। यह सुनकर वह असुर रावण फिर बोला कि विष्णुने आजतक जिन राक्षसोको मारा है, वे किस गतिको प्राप्त हुए हैं ? । १२१ ॥ मुनिने कहा-वे सब उत्तम तथा दुर्लभ मुक्तिको प्राप्त हुए हैं। उस राक्षसन फिर प्रश्न किया कि किस उपायसे मेरी मृत्यु श्रीहरिके हाथो हो सकती है ? मुनिने उसके प्रश्नका उत्तर देते हुए कहा कि त्रेतायुगमे विष्णु अयोध्यामें मनुष्यका रूप धारण करेंगे । १२२ ॥ १२३ । उस समय उनसे घोर वैर करके उन परमात्मा रामके हाथों तुम अपना वध करवा लेना ॥ १२४ ॥ उससे तुम मुक्तिपदको प्राप्त हो जाओगे यह बात मनमें रखकर रावणने रामके साथ विरोध करनेके लिए ही गौतमी नदीके तटसे जनकनन्दिनी सीताका