भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 811 में से

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पृष्ठ 170

१५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३


एकदा नारदं दृष्ट्वा नत्वा पप्रच्छ रावणः ।१२६॥
भगवन् ब्रूहि मे योद्धुं कुत्र सन्ति महाबलाः ।
योद्धुमिच्छामि बलिभिस्त्वं जानासि जगत्त्रयम्॥१२७॥
मुनिर्ध्यात्वा चिरञ्चाह श्वेतद्वीपनिवासिनः । महाबला महाकायास्तत्र याहि महामते ॥१२८॥
विष्णुपूजारता ये वै विष्णुना निहताश्च ये । त एव तत्र सजाता अजेयाश्च सुरासुरैः ॥१२९॥
तच्छ्रुत्वा रावणो वेगात्सन्त्रिभिः पुष्पकेण तैः ।
योद्धुकामो ययौ गर्वाच्छ्वेतद्वीपान्तिकं मुदा ॥१३०॥
तत्प्रभाहतनेत्रार्कं पुष्पकं नाचलत्पुरः ।
त्यक्त्वा विमानं प्रययौ स्वयमेव दशाननः ॥१३१ ।
प्रविशन्नेव तद्द्दीपं धृतो हस्तेन योषिता ।
गच्छन्त्या कस्यचिद्दास्या पुष्पाण्यानयितुं वनम् ॥१३२ ।
तया पृष्टः कुतः कोऽसि प्रेषितः केन वा वद । इत्युक्त्वा लीलया स्त्रीभिर्हसतीभिर्मुहुर्मुहुः ॥१३३ ।
मुखेषु ताडितो हस्तैर्भ्रामितोऽथोत्प्लुतं चिरम् । अन्यैकं तत्पदं ताभिः क्षिप्तः कंदुकवन्मुहुः ॥१३४॥
परस्परं हि क्रीडद्भिः कया त्यक्तस्तु लीलया । पपात परलंकायां क्रौंचायाः शौचकूपके ॥१३५।
कृच्छ्राद्धस्ताद्विनिर्मुक्तस्तासां स्त्रीणां दशाननः ।
आश्चर्यमतुलं लब्ध्वा चिन्तयामास दुर्मतिः ॥१३६।
विष्णुना ये हता युद्धे तेषामेतादृशं बलम् । तन्नैव निहतस्तेन श्वेतद्वीप व्रजाम्यहम् ॥१३७।
मयि विष्णूर्यथा कुप्येत्तथा कार्यं करोम्यहम् ।
इति निश्चित्य वैदेहीं जहार रावणो वनात् ॥१३८॥


हरण कर लिया था ॥ १२५ । अपने बच्चोंकी इच्छासे ही उसने सीताको अशोकवनमें रखकर माताके समान रक्षा की थी। एक बार रावणने नारद मुनिको देखकर नमस्कार किया और पूछा -॥ १२६ ॥ हे भगवन् ! आप कृपा करके यह बताइये कि मुझसे लड़नेवाले बलवान् लोग कहाँ हैं ? मै बलवानोंसे युद्ध करना चाहता हूँ आप तीनों लोकके लोगोंको जानते हैं ॥ १२७ । मुनिने स्तिक देर ध्यान करके कहा कि श्वेतद्वीपके लोग बड़े भारी शरीरवाले होते हैं और वे नित्य भगवान्‌की पूजामे लगे रहते हैं, जो लोग विष्णुके हाथों मारे जाते हैं, वे ही सुरों तथा असुरोंसे अजय होकर वहाँ जन्म लेते हैं ॥ १२८ ॥ १२९ । यह सुनकर प्रसन्न रावण अपने मन्त्रियोंके साथ पुष्पक विमानपर सवार होकर गर्व तथा दंभके साथ उन लोगोंसे युद्ध करनेकी इच्छासे श्वेतद्वीपकी ओर चल पड़ा । १३० । परन्तु उस द्वीपकी कान्तिसे चौंधियाकर उसका विमान रुक गया । तब रावण विमान छोड़कर पैदल चलने लगा । १३१ ॥ द्वीपमें घुसते ही एक स्त्रीने उसको एक हाथसे पकड़ लिया। वह किसीकी दासी थी और वनमें पुष्प लेने जा रही थी ॥ १३२ । उस स्त्रीने रावणसे पूछा कि तू कौन है और तुझे यहाँ किसने भेजा है ? बता। इतना कहकर कुछ स्त्रियां बारम्बार हँसकर लीलापूर्वक उसके मुखपर तमाचे लगाने लगीं। बादमें उसका पाँव पकड़ तथा उसको औंधे सिर घुमाकर गेंदकी भाँति दूर फेंक दिया । १३३ ॥ १३४ ॥ आपसमें एक दूसरेके साथ खेलती हुई किसी एक स्त्रीने ही यह काम किया था। इस प्रकार फेंकनेपर रावण परलंकामें क्रौंच के शौचालयमें जा गिरा। १३५ ।। इस प्रकार रावण उन स्त्रियोंके हाथोंसे बड़ी कठिनईसे छूटा और आश्चर्यचकित होकर यह दुष्ट विचारने लगा -॥ १३६ ॥ ओहो ! विष्णु जिनको मारते हैं, वे लोग इतने बलवान् हो जाते हैं। इसलिए मैं भी उनसे मारा जाकर श्वेतद्वीपमें जाऊँगा ॥ १३७ । अब मैं वही काम करूँगा कि जिससे विष्णु मेरे ऊपर क्रुद्ध हों यही सोचकर वनमें रावणने

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