श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १३ ] उत्तरकाण्डम् १५५
वानवेवं महाशर्मा स अहोरात्रनीसुताम् ।
मातृवत्पालयामास स्वतः काङ्क्षन्वधं निजम् ॥ १३९॥
श्रीरामचन्द्र उवाच
वालिसुग्रीवयोर्जन्म श्रोतुमिच्छामि नन्मुखात् । स्वीयौ वानरकारौ जाताव इति तच्छ्रुतम् ॥ १४०॥
अगस्त्य उवाच
मेरौ स्वर्णमये पूर्वं सभायां ब्रह्मणः कदा । नेत्राभ्यां पतितं दिव्यमानंदाश्रुजलं तदा ॥ १४१॥
तद्गृहीत्वा करे ब्रह्मा ध्यात्वा किंचिनदधस्त्यजत् ।
भूमौ पतितमात्रेण तस्माज्जातो महाकपिः ॥ १४२॥
तमाह द्रुहिणो वत्स त्वमत्र वस सर्वदा ।
एवं बहुतिथे काले गतेर्षवरिङ्गः सुधीः ॥ १४३॥
कदाचित्पर्यटन्मेरौ फलमूलाद्यनेषणः । अपश्यद्धिरण्मयशिलां वापीं मणिशिलाचिताम् ॥ १४४॥
पानीय पातुमगमत्तत्र छायामथ कपिस्त्वभूत् । दृष्ट्वा प्रतिकपिं मत्वा निपपात जलांतरे ॥ १४५॥
तत्रादृष्ट्वा हरिं शीघ्रं बहिर्हप्तुत्य संययौ । अपश्यत्सुन्दरीं नारीमात्मानं विस्मयं गतः ॥ १४६॥
ततो ददर्श मघवा सोऽप्यजद्वीर्यमुत्तमम् । तामप्राप्यैव तद्वीर्यं बालदेशेऽपतद्भुवि ॥ १४७॥
वाली समभवत्तत्र शक्रतुल्यपराक्रमः ।
भानुष्यागात्तसत्र तदनीमेव भामिनीम् ॥ १४८॥
दृष्ट्वा कामवशो भूत्वा ग्रीवादेशेऽसृजन्महतू । वीजं तस्यास्ततः सद्यो सुग्रीवो बलवानभूत् ॥ १४९॥
अङ्के च समादाय गतवा सा निद्रिता क्वचित् । प्रभावेऽकस्यदानभान पूर्ववद्वानराकृतिम् ॥ १५०॥
तद्वृत्तं तु विधिः श्रुत्वा किष्किन्धाराज्यमुत्तमम् ।
ददौ स वानरेन्द्राय पुत्राभ्यां तत्र संस्थितः ॥ १५१॥
बंदरोंका हरण कर लिया ॥ १३८ ॥ उसने यह भी जान लिया था कि ये दावानल पवनिसुता रुद्रभो हैं। इसीलिए उसने अपने वधकी इच्छा करके शाताको माताके समान पाला था ॥ १३९ ॥ श्रीरामचन्द्र बोले हे मुने ! मैं आपके मुखसे बालि और सुग्रीवके जन्मकी कथा सुनना चाहता हूँ । मैंने सुना है कि स्वयं सूर्य तथा इन्द्र वानरका रूप धारणकर बालि-सुग्रीवके रूपमें उत्पन्न हुए थे ॥ १४० ॥ अगस्त्य मुनि बोले—मेरु पर्वतके स्वर्णशिखरपर एक बार भरी सभामें सहसा ब्रह्माके नेत्रसे दिव्य आनन्दाश्रु निकल पड़ा ॥ १४१ ॥ ब्रह्माजीने उसको हाथमें ले तथा कुछ ध्यान धरनेके पश्चात् जमीनपर डाल दिया । गिरनेके साथ ही उससे एक महान् कपि उत्पन्न हो गया । १४२ ॥ तब ब्रह्माने उससे कहा—हे वत्स ! तुम सदा यहीं रहो। वहीं रहते हुए कुछ दिन बीतनेपर वह ऋक्षविरजः कपि किसी समय मेरु पर्वतपर घूमता फिरता फल मूल आदिके लिए एक वावली पर पहुँचा । उसने वहाँ मणिकी शिलाओंसे बनी हुई स्वच्छ जलवाली एक बावली देखा ॥ १४३ ॥ १४४ ॥ जब वह पानी पीने लगा तो उसे अपना छाया दिखाई दी । उसे अपना प्रतिपक्षी समझकर वह जलम कूद पड़ा ॥ १४५ ॥ किन्तु उसने जब उसको दूसरा वानर नहीं दिखाई पड़ा, तब वह उछलकर बाहर निकल आया । बाहर निकलनेके साथ ही वह एक सुन्दरी स्त्रीके रूपमें परिणत हो गया । यह देखकर उसको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ १४६ ॥ बादमे जब इन्द्रने उसको देखा तो कामवश उनका वीर्य निकलकर उस स्त्रीके बालों-पर जा गिरा ॥ १४७ ॥ उससे इन्द्रतुल्य पराक्रम वानर वालि पैदा हुआ। उसी समय सूर्यदेव भी वहाँ पर पहुंचे ॥ १४८ ॥ उस सुन्दरी कामिनीको देखकर वे भी कामातुर हो उठे और उस स्त्रीकी गर्दनपर उनका महद् वीर्य गिर पड़ा। जिससे उसी समय बलवान् वानर सूर्यज उत्पन्न हुआ ॥ १४९ ॥ उन दोनों पुत्रोंको कहीं गोद में बांधकर वह स्त्री सो गयी । प्रातःकाल होनेपर उसने फिर अपने आपका वानररूपमें पाया ॥ १५० ॥