भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३


मृतेऽर्क्षरजस्याभूद्वाली पूर्वी कपीश्वरः । एवं ते कथितं राम यथा पृष्टं त्वया मम ॥१५२॥
श्रीरामचन्द्र उवाच
यदाऽसौ वालिना बंधुः किष्किन्धाया बहिष्कृतः ।
तदा तस्यैव सचिवः श्रीमत्पवननंदनः ॥१५३॥
न वेद किं बलं नैजं वालितुल्यपराक्रमः । इति रामवचः श्रुत्वा पुनस्तं मुनिरब्रवीत् ॥१५४॥
अगस्त्यउवाच
केसरीनाम विख्यातः कपिरंजनपर्वते ।
तस्यास्तां च शुभे पत्न्यो वानयर्विकटा गिरौ ॥१५५॥
प्लवंगस्याञ्जनीनाम्नी स्थिता तावच्च खात्तदा ।
पपात पायसमयः पिंडो गृध्रोन्मुखाद्भुवि ॥१५६॥
यदा नीतस्तु कैकेय्या कराद्गृध्रया शुभः पुरा । तं पिंडं भक्षयामास वानरी चामृतोपमम् ॥१५७॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र मार्जारास्या समागता । पतिना रहिते ते द्वे क्रीडन्त्यौ वसनं तयोः ।१५८॥
अहरत्पवनो वेगादूर्ध्वदृष्ट्वा वायुस्तदूरूः ।
अञ्जनीं प्रार्थयामास तया भोगं चकार सः ॥१५९॥
यथैव प्रार्थयामास मार्जारास्यां स निर्ऋतिः । तयाऽकरोद्रतिं तत्र सोऽपि पर्वतसूर्द्धनि ।१६०॥
तयोस्ताभ्यां समुत्पन्नौ वानरौ मारुतात्मजः ।
मार्जार्याः समभूद्घोरः पिशाचो बर्घरस्वनः ॥१६१॥
चैत्रे मासि सिते पक्षे हरिदिन्यां मघामिखे । नक्षत्रे स समुत्पन्नो हनुमान् रिपुसूदनः ॥१६२॥
महाचैत्रीपूर्णिमायां समुत्पन्नोऽञ्जनीसुतः । वदन्ति कल्पभेदेन बुधा इत्यादि केचन ॥१६३॥
बालभावेऽपि च. पूर्वं दृष्ट्वैव विभावसुम् ।
मत्वा पक्वफलं चेति जिघृक्षुर्खत्यपोत्प्लुतः ॥१६४॥


यह वृत्तान्त सुनकर ब्रह्माजीने वानरेन्द्र ऋक्षरजाको किष्किन्धा नगरीका उत्तम राज्य दे दिया। जहाँपर वह अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहने लगा ॥ १५१ ॥ उस ऋक्षरजाके मर जानेपर किष्किन्धापुरीका राजा बलीश्वर बाली हुआ। हे राम ! जो आपने पूछा, मैने वह सब कह दिया ॥ १५२ । श्रीरामचन्द्र बोले— जब सुग्रीवको बालीने किष्किन्धासे बाहर निकाल दिया था, उस समय इनके मन्त्री ये वायुनन्दन हनुमान् भी साथ थे ॥ १५३ ॥ पर इनको बालीके समान अपना बल क्यों नहीं याद आया ? रामके इस वचनको सुनकर मुनि अगस्त्य फिर कहने लगे— ॥ १५४ ॥ अंजन पर्वतनिवासी केसरी नामसे विख्यात कपिकी दो बानरी स्त्रियें थीं ॥ १५५ ॥ किसी समय उस कपिकी अंजनी नामकी स्त्री वहाँ बैठी थी । इतनेमे आकाशसे किसी गृध्रीके मुखसे छूटकर पायसका एक पिण्ड आ गिरा ॥ १५६ ॥ यह पिण्ड वही था जो कि पहले कैकेयी- के हाथसे एक गृध्री छीन ले गयी थी । उस अमृततुल्य पिण्डको बानरीने खा लिया ॥ १५७ ॥ इतनेमें वहाँ वह दूसरी मार्जारास्या बानरी भी आ पहुंची । पतिकी अनुपस्थितिमें वे दोनो क्रीड़ा कर रही थीं । तत्रो उन दोनोंके वस्त्रोंको पवनने उड़कर ऊंचे उठाया तथा उनकी जाँघोंको देख लिया। पश्चात् अंजनीसे प्रार्थना करके उसके साथ वायुने भोग किया ॥ १५८ ॥ १५९ ॥ उसी प्रकार निर्ऋतिने मार्जारास्यासे प्रार्थना करके पर्वतके शिखरपर इसके साथ रति की ॥ १६० ॥ उन दोनोंसे उन दोनोंने—बानरीसे मारुतात्मज हनुमान् तथा मार्जारीसे घोर बर्घरस्वन पिशाच उत्पन्न हुआ ॥ १६१ ॥ चैत्र शुक्ल एकादशीके दिन मघानक्षत्रमें रिपुसूदन हनुमान्- का जन्म हुआ था ॥ १६२ ॥ कुछ पण्डित कल्पभेदसे चैत्रकी पूर्णिमाके दिन हनुमान्का शुभ जन्म हुआ, ऐसा कहते हैं ॥ १६३ ॥ वे हनुमान् बाल्यकालमें ही सूर्यको देख तथा उन्हें पका फल समझकर उसको लेनेकी