भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 811 में से

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पृष्ठ 179

सर्गः २ ] बालकाण्डम् १५३

चतुर्मुखं महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुंगवम् । भार्यादित्यं तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय वाग्यतः ॥२४॥
प्रांजलिः प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मितः । पूजयामास तं देवं पाद्यार्घ्यासनवन्दनैः ॥ २५॥
प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वा चैव निरामयम् । अथोपविश्य भगवान्त्ससने परमाविरे ॥ २६॥
महर्षये वाल्मीकये सन्दिदेशासनं ततः । ब्रह्मण समनुज्ञातः सोऽप्युपाविशदासने ॥२७॥
उपविष्टे तदा तस्मिन् साक्षाल्लोकपितामहे । तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिर्ध्यानमास्थितः ॥ २८॥
पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना यस्तादृशं चारुरवं क्रौंच हन्यादकारणम् ।२९॥
शोचन्नेव पुनः कौञ्चीमुपश्लोकमिमं जगौ पुनरंतर्गतमना भूत्वा शोकपरायणः ॥३०॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुंगवम् । श्लोक एष त्वया बद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१॥
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती । रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम ॥ ३२॥
धर्मात्मनो गुणवतो लोके रामस्य धीमतः ॥३३॥
वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् । रहस्यं च प्रकाशं च यद्वृत्तं तस्य धीमतः ॥ ३४॥
रामस्य सह सौमित्रेः कीशानां रक्षसां तथा । वैदेह्याश्चैव यद्वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ॥ ३५॥
तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति । न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ॥ ३६॥
कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् । यावत्स्थास्यंति गिरयः सरितश्च महीतले ॥३७॥
तावद्रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति । यावद्रामायणकथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति ॥३८॥

विचार करते हुए वे धर्मज्ञ मुनि शिष्योंके साथ बैठकर सम्भाषण हास्य करने लगे ॥ २२ ॥ इतनेमें वहीं समस्त लोकोंके कर्त्ता चतुर्मुख प्रभु महातेजस्वी ब्रह्मा उस मुनिश्रेष्ठसे मिलनेके लिए आ पहुँचे ॥ २३ ॥ उनको अचानक आये देखकर वाल्मीकि मुनि विस्मयान्वित तथा अवाक् हो गये। परन्तु वे तुरन्त हाथ जोड़कर नम्रभाव उनके सामने खड़े हो गये ॥ २४ ॥ पश्चात् धीरेसे मनको स्थिर करके मुनिने ब्रह्माजीसे कुशल समाचार पूछा तथा पाद्य, अर्घ्य, आसन, स्तुति, प्रणाम आदिसे उनका सत्कार किया। ब्रह्माजीने भी उनके तप आदिका कुशल पूछा और अपने लिए बिछाये हुए आसनपर स्वयं बैठकर वाल्मीकिजीको भी आसनपर बैठनेके लिए कहा। लोकोंके साक्षात् पितामह ब्रह्माजीके आसनपर बैठ जानेपर उनकी आज्ञासे वाल्मीकि ऋषि भी बैठ गये ॥ २५-२७॥ किन्तु उस समय भी उनका मन क्रौञ्चपक्षीके विषयमें ही सोच रहा था कि पापो अगाध करण तथा निर्दोष जीवोंपर मिथ्या वैरभाव रखनेवाले उस व्याधने यह बड़ा कष्टप्रद काम किया ॥ २८ ॥ जो कि सुन्दर बोली बोलनेवाले, निर्दोष तथा कामके वशीभूत उस पक्षीको बिना कारण ही मार डाला और मैंने भी उस व्याधको शाप दे दिया, सो भी बड़ा खराब काम हुआ। ऐसे विचारमें मन और शोकमें डूबें हुए वाल्मीकि कौञ्चका शोक करते हुए फिर पड़ो बात मनमें सोचने लगे। बादमें उन्होंने व्याधको शाप देते समय जो श्लोक कहा था, उसीको उन्होंने ब्रह्मा के के सम्मुख कहा। उसको सुनकर ब्रह्माजी हँसकर मुनिसे कहने लगे ॥ २९ ५ ३० । हे ब्रह्मन् ! तुम्हारे एकाएक कहा हुआ यह श्लोक यशके रूपमें परिणत हो जायगा। इसमें तुम क्षणिक भी संशय न करना। यह तो मेरी इच्छा तथा प्रेरणासे ही तुम्हारे मुखसे यह सरस्वती प्रवृत्त हुई है ॥ ३१ ॥ हे मुनीश्वर ! तुम मेरी आज्ञासे धर्मात्मा क्षमावान् अखिललोकके स्वामी परम बुद्धिमन् राजा रामका संपूर्ण चरित रचो ॥ ३२ ॥ धैर्यशाली तथा बुद्धिमान् रामका जो चरित्र तुमने नारदसे सुना है, वह तथा और भी गुप्त व प्रकट चरित्र हो, उसको तुम रचकर प्रकाशित करो ॥ ३३ । सुमित्रानुज लक्ष्मण सहित रामचन्द्रका, वानरोंका, सब राक्षसोंका तथा सीताका गुप्त अथवा प्रकट जो भी वृत्तान्त तुम न जानते होगे, वह सब भी मेरी कृपासे जान जाओगे और शुभके चरित्रसे भरे हुए उस काव्यमें निहित तुम्हारी वाणी असत्य नहीं होगी ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ तुम ऐसे श्लोकोंमें ही मनको आनन्द देनेवाली पवित्र रामकथा लिखो। जबतक संसारमें सूर्य-चन्द्र रहेंगे, तबतक तुम्हारे रची हुई रामकथा की लोकमें प्रसारित होती रहेगी। जबतक तुम्हारी रची हुई रामकथा पृथ्वीमण्डलपर स्थित रहेगी, तबतक तुम मेरे ऊपरके तथा नीचेके सब लोकोंमें

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