श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १ |
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वाल्मीकिस्त्वेकदा स्नातुं जगाम तमसां नदीम् । शिष्येण सहितो गत्वा भूमौ स्थाप्य कमण्डलुम् ॥९॥
आवश्यकं तु संपाद्य कृत्वा शौचविधिं ततः । यावच्चलति स्नानार्थं दर्भपाणिः स वै मुनिः ॥१०॥
तावद्ददर्श तमसातीरे कौतुकमुत्तमम् । क्रौञ्चयुग्मे हतः क्रौञ्चो निषादेन पतत्त्रिणा ॥११॥
क्रौञ्ची शोकसमाविष्टा विललापातिदुःखिता । वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा ॥१२॥
ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा मा हतेन च । तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् ॥१३॥
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समजायत । ततः करुणयाऽऽविष्टस्त्वधर्मोऽयमिति द्विजः ॥१४॥
निशम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् । मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ॥१५॥
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् । तस्येत्थं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षतः ॥१६॥
शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया । चिन्तयन् महाप्राज्ञश्चकार मतिमान् मतिम् ॥१७॥
शिष्यं चैवाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुंगवः । पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः । १८॥
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा । शिष्यस्तु तस्य श्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम् । १९॥
प्रतिजग्राह संतुष्टस्तस्य तुष्टोऽभवन्मुनिः । सोऽभिषेकं ततः कृत्वा तीर्थे तस्मिन्यथाविधि ॥२०।
तमेव चिंतयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनिः । भारद्वाजस्ततः शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरोः ॥२१॥
कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतश्च जगाम ह । स प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित् ॥२२॥
उपविष्टः कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थितः । तत्राजगाम लोकानां कर्ता ब्रह्मा स्वयं प्रभुः । २३।
पहिले एक समयमें किया था, सो तुम्हे सुनाता हूँ ॥ ८ ॥ एक समय वाल्मीकिमुनि अपने शिष्य भारद्वाजको साथ लेकर तमसा नदीपर स्नान करनेके लिए गये, वे रास्ते में जमीनपर कमंडलु रख तथा आवश्यक शौचादि कर्ममें निवृत्त होकर ज्यों ही हाथमें कुशा ग्रहण करके स्नान करनेके लिए चले । ६ ॥ १० ॥ त्यों ही उन्होंने तमसा नदीके तटपर एक उत्तम कौतुक देखा। वह यह कि एक निषादने बाणसे क्रौंच तथा क्रौंचीके जोड़ेमेंसे क्रौंच (बगुले) को मार डाला ॥ ११ ॥ तब क्रौंची शोकातुर होकर अतिदुःखसे विलाप करने लगी। वह बेचारी अपने सहचर, तांबेके समान लाल मस्तकवाले, मत्त और बाणसे मारे गये अपने पति पक्षी से वियुक्त गयी थी। निषादके द्वारा मारे गये उस पक्षीकी दशा देखकर धर्मात्मा वाल्मीकि ऋषिके मनमें बड़ी करुणा उत्पन्न हुई। पश्चात् उस क्रौंचीके दयाजनक रुदनको सुननेसे करुणाक्रान्त हो और 'यह बड़ा अधर्म हुआ' ऐसा विचारकर मुनि बोले- ॥१२-१४॥ अरे निषाद ! तूने एक कामासक्त जोड़ेके क्रौंच पक्षीको मार डाला है, इसलिए तू भी प्रत्युत वर्षोंतक प्रतिष्ठाको नहीं प्राप्त होगा अर्थात् बहुत काल पर्यन्त जीवित नहीं रहेगा ॥ १५ ॥ इस प्रकार अनुष्टुप्-छन्दोबद्ध वाणी सहसा अपने मुखसे निकल पड़नेके कारण आश्चर्य पाकर तथा क्रौंचके शोकसे पीडित उस ऋषिके मनमें 'ओह ! इस निषादको मैने यह क्या कह दिया ! इससे वा मुझे बडा भारी पाप लग गया' ऐसी चिन्ता होने लगी ॥ १६ ॥ ओह ! यह तो मुझसे बड़ा भारी अपयश देनेवाला काम हो गया। ऐसी चिंता करते हुए मनमें कुछ निश्चय करके महामतिमान् मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिने अपने शिष्य भारद्वाजसे कहा-॥ १७॥ वत्स ! शोकवश होकर मैने निषादको शाप दे दिया। यह हुआ तो अनुचित, तथापि शोकसे दुःखित होनेके कारण मेरे मुखसे आठ अक्षरोंवाले चार चरणोंयुक्त समान पदोंसे विशिष्ट तथा ताल-स्वरपर गाने योग्य यह अनुष्टुप् छन्द श्लोकरूपमें (यशरूपमें) ही प्रवृत्त हो अपयशस्वरूप न हो । १८ ॥ पश्चात् मुनिके इन श्रेष्ठ वाक्यों सुनकर उनके प्रसन्नवदन शिष्य भारद्वाजने 'यह श्लोक आपके इच्छानुसार यशरूप ही होगा' ऐसा कहकर उनकी बातका समर्थन किया इससे वाल्मीकि उनके ऊपर प्रसन्न हुए ॥ १९ । तदनन्तर तमसा नदीके जलमें यथाविधि स्नान आदि कृत्य करके वे महर्षि 'मेरा अपयश कैसे यशरूपमें परिणत हो जाय' ऐसा विचार करते हुए अपने आश्रमकी ओर चल दिये ॥ २० ॥ उनके पीछे उनके विद्वान् और विनम्र शिष्य भारद्वाज भी कलश उठायकर चल पड़े ॥२१॥ आश्रममें पहुँचनेपर भी वे "निषादको दिया हुआ शाप यशरूपमें कैसे परिणत हो" इसी बातका मनमें